मैं तो हरग़िज़ भी न था रूठ के जाने वाला।
कोई होता तो सही मुझको मनाने वाला।।
बुझ गईं तुझ से बिछड़ कर मेरी दोनों आँखें।
इन चिराग़ों को नहीं कोई जलाने वाला।।
ज़िन्दगी जिसके तआक़ुब में गवां दी हमने।
इन चिराग़ों को नहीं कोई जलाने वाला।।
ज़िन्दगी जिसके तआक़ुब में गवां दी हमने।
ऐक साया था कभी हाथ न आने वाला।।
साफ कह दो के मेरा साथ नहीं है मन्ज़ूर।
क्यों पढ़ाते हो सबक़ मुझ को ज़माने वाला।।
उठ गया अन्जुमने ज़िन्दा दिलां से 'अहमर'।
साफ कह दो के मेरा साथ नहीं है मन्ज़ूर।
क्यों पढ़ाते हो सबक़ मुझ को ज़माने वाला।।
उठ गया अन्जुमने ज़िन्दा दिलां से 'अहमर'।
अब कोई और नहीं बज़्म पे छाने वाला।।
"अहमर काशीपुरी"
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