शहर से दूर जो टूटी हुई ताअमीरें हैं।
अपनी रूदाद सुनाती हुई तसवीरें हैं।।
मेरे अश्आर को अश्आर समझने वालो।
मेरे अश्आर को अश्आर समझने वालो।
यह मेरे खून से लिक्खी हुई तहरीरें हैं।।
जाने कब तेज़ हवा किसको उड़ा ले जाये।
हम सभी फर्श पे बिखरी हुई तसवीरें हैं।।
ज़हन आज़ाद है हर कै़द से अब भी मेरा।
लाख कहने को मेरे पाँव में ज़न्जीरें हैं।।
आरज़ू कर्ब अलम शौक तमन्ना हसरत।
आरज़ू कर्ब अलम शौक तमन्ना हसरत।
ज़ीस्त वोह लफ्ज़ जिसकी कई तफसीरें हैं।।
ज़िन्दगी हमको वहाँ लाई है 'अहमर' के जहाँ।
जुर्म ही जुर्म हैं तअज़ीरें ही तअज़ीरें हैं।।
"अहमर काशीपुरी"
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