कोई बाज़ी न जीत पाये हम।
ज़िन्दगी तुझसे बाज़ आये हम।।
जब भी तुझ पड़ा है वक़्त कोई।
ज़िन्दगी तेरे काम आये हम।।
न मिला तन को सायबाँ का लिबास।
उम्र भर धूप में नहाये हम।।
पड़ गये बल कई ज़बीनों पर।
जब तेरी अंजुमन में आये हम।।
ज़ीस्त कतरा रही है यूँ हमसे।
जैसे आये हों बिन बुलाये हम।।
राहतें ढूँढती फिरीं हमको
हाथ उनके कभी न आये हम।।
अपनी फितरत ही इस तरह की है।
ज़ख़्म खा कर भी मुस्कुराये हम।।
दोस्तो का तो ज़िक्र ही क्या है।
दुश्मनों के भी काम आये हम।।
"अहमर काशीपुरी"

Hai Nehayat Khoobsoorat yeh blog
ReplyDeleteDeta hai yeh dawat e fikr o nazar
Hai yeh Ahmar ka shoor e fikr o fuN
Un ke aijaaz e qalam meiN jalwa gar