अहकर काशीपुरी की शायरी पर तबरे

पेश-लफ्ज़

 

ग़ज़ल एक सिन्‍फ-ए-सुखन है, जिसके लुगवी मा’ईना महबूब से बात करना होता हैं, लेकिन जदीद ग़ज़ल में शाइर महबूब के अलावा दुनिया और समाज के मुख्तलिफ पहलुओं पर अपने ख़यालात पेश करता है, तो इस तरह आज ग़ज़ल महबूब से बातें करने के साथ-साथ दुनिया से भी बातें करने का ज़रिया बन चुकी है।

ज़माना-ए-क़दीम से लेकर आज तक दीगर शुअरा-ए-कराम इस फन में महारत हासिल कर चुके हैं और सभी ने ही अपने-अपने अंदाज़ में शायरी के हुस्न में इज़ाफा किया है। ये सिलसिला आज भी जारी है, लिहाज़ा इस फेहरिस्त में एक नाम जनाब मुबारक हुसैन ‘अहमर’ काशीपुरी का भी आता है, जिनका कलाम उर्दू अदब में अपनी एक ख़ास अहमियत रखता है। आपने रिवायती ग़ज़ल के साथ-साथ जदीद ग़ज़ल में भी अपने ख़यालात का इज़हार किया है। जनाब ‘अहमर’ काशीपुरी एक तवील अर्से तक शायरी करते रहे। आपका कलाम मौजूदा समाज और इसमें पेश आने वाले तमाम छोटे-बड़े मसाइल की तर्जुमानी करता है। 

मोहतरम जनाब मुबारक हुसैन ‘अहमर’ काशीपुरी किसी तार्रुफ़ के मोहताज नहीं हैं। आपका कलाम ही आपकी पहचान है। आपके वालिद-ए-मोहतरम का नाम जनाब सूफी करीम बख्श और वालिदा का नाम मोहतरमा नूर जहाँ बेगम था। आपकी पैदाइश 31 जुलाई 1932 को हिंदुस्तान की उत्तरी रियासत उत्तराखंड के तराई ज़िला उधम सिंह नगर के तारीख़ी और सनअती शहर काशीपुर में हुई। दो बेटियों के बाद आप अपने वालिद-ए-मोहतरम की सबसे छोटी औलाद हैं। आपके वालिद-ए-मोहतरम का शुमार इलाक़े के दानिश्वर तबक़े में किया जाता था। वह एक तालीमयाफ़्ता, समाजी कारकुन, सच्चे मुहिब-ए-वतन और बा-वक़ार शख्सियत के मालिक थे। 

आपकी शख्सियत पर आपके वालिद का अक्स साफ़ नज़र आता है। आपने वालिद-ए-मोहतरम की सरपरस्ती में उर्दू और फ़ारसी की तालीम हासिल की। आपको उर्दू अदब से गहरी दिलचस्पी रही है, इस लिए आपने उर्दू और फ़ारसी अदब का गहरा मुताअला किया। मीर, गालिब, ज़ौक़ और इक़बाल को अपना आईडल समझते हुए आहिस्ता-आहिस्ता शायरी में अपना क़लम आज़माना शुरू किया। देखते ही देखते आपका कलाम लोगों की ज़बान पर सर चढ़कर बोलने लगा। आपने ग़ज़ल की तकनीक को बाक़ायदा सीखा और समझा है, ग़ज़ल के इस फन को मज़ीद बेहतर बनाने के लिए आपने अपने ज़माने के मशहूर-ओ-म’आरूफ़ उस्ताद शाइर जनाब भगवती प्रसाद भटनागर अहक़र काशीपुरी की सरपरस्ती इख़्तियार की। उनकी सरपरस्ती में रहकर आपने ग़ज़ल की बारीकियाँ सीखीं। अब आपकी ग़ज़लें पहले से बेहतर और मशहूर होने लगीं। लिहाज़ा आपको मुशायरों और नशिस्तों में शिरकत करने के मवाक़े फराहम होने लगे। आपने मुक़ामी और बैरूनी बहुत से मुशायरों में शिरकत फ़रमाई। मुशायरों में कामयाबी हासिल करने के बाद आप अख़बारात, मैगज़ीन और आकाशवाणी से वाबस्ता हो गए। 

सच्ची लगन और मुसलसल कोशिशों की वजह से आपका शुमार उस ज़माने के नामवर शु’अरा में किया जाने लगा। आपकी शोहरत इस हद तक बढ़ी कि उस वक़्त के मशहूर शुअरा-ए-कराम जैसे मोहतरम जनाब गौहर उस्मानी, मोहम्मद अली मौज, रईस रामपुरी साहब आपके रहबर और दोस्त बन गए और आपकी सलाहियतों को निखारने में मदगार साबित हुए। आपने पुराने दौर के मशहूर-ओ-म’आरूफ़ शु’अरा-ए-कराम जनाब मोनिस बरेलवी, होश नुमानी, अज़हर इनायती, वसीम बरेलवी, साहिल सहरी, डॉक्टर शाकिर हुसैन इस्‍लाही, फ़हमी बदाँयूनी, ज़फ़र काशीपुरी, नश्तर काशीपुरी और मनोज आर्य साहब के साथ तवील अर्से तक नशिस्तों और मुशायरों में शिरकत फ़रमाई। ये तमाम शु’अरा भी आपकी शायरी और हुनर के मुअतरिफ़ रहे हैं। मुक़ामी ऐतबार से जनाब प्रफेसर आसिफ हुसैन, डॉक्टर यूसुफ बहादुर ख़ान, मास्टर मोहम्मद फ़ारूक़, अज़ीज़ क़ुरैशी, हनफ़ी काशीपुरी, पयाम काशीपुरी, डॉक्टर अहमद काशीपुरी, ख़ंजर काशीपुरी, आसिम काशीपुरी, क़तील काशीपुरी, तुफैल चितरवेदी, मुबारक हुसैन मुश्फ़िक़, सग़ीर अशरफ़, इंजीनियर मोहम्मद इक़बाल, सदर अब्दुल हमीद, हाजी अब्दुर्रशीद नल वाले, हाजी जमील, हरदासी लाल महरोत्रा, हरवंश लाल साईकिल वाले और दीगर हज़रात से आपके गहरे मरासिम रहे हैं। इनके अलावा जनाब शिव नन्‍दन अग्रवाल, और सेठ सुरेश साहब भी आपके हम-जमात और रफी‍क़ रहे हैं।

आपने ज़िन्दगी के तक़रीबन हर पहलू पर अपनी सलाहियतों का इस्तेमाल किया है। सीधी और आम फ़हम बात को अपनी शायरी में ढालने का हुनर आपको बख़ूबी आता था। आप शायरी में हमेशा इस बात का ख़याल रखते थे कि क़ारी को हक़ीक़ी दुनिया से रुबरु कराया जाए। आपकी शायरी में मौजूदह ज़िन्दगी और इसमें दर पेश रोज़ मर्रा की छोटी बड़ी बातों को बड़ी ख़ूबी से नक़्ल किया गया है। आपकी अकसर ग़ज़लें आम और सादा ज़बान में होती हैं, इस लिए आज भी आपके चाहने वालों की कोई कमी नहीं है। 

आपने उर्दू अदब की हर सनफ जैसे नात, हम्द, क़त्‍आ, रुबाई, नज़्म, क़सीदा और ग़ज़ल में अपना क़लम आज़माया है। आपकी शायरी की ये  रिवायत यही ख़त्म नहीं होती। आपके फ़रज़न्द इक़बाल अदीब काशीपुरी एक बेहतरीन और कामयाब शाइर हैं जो आपको अपना उस्ताद और आईडल मानकर शायरी कर रहे हैं। साथ ही आपके पोते शारिक़ सिद्दीक़ी भी एक नौजवान शाइर हैं, जो नयी नस्ल की नुमाइंदगी करते हुए जदीद शायरी में कामयाबी हासिल कर रहे हैं। आपकी शायरी की बदौलत आपको एक उस्ताद शाइर होने का शरफ़ हासिल है। इसलिए दीगर मुक़ामी शु’अरा-ए-कराम आपको अपना उस्ताद और मोहतरम मानते हैं जिनमें जनाब ख़ुरशीद अहमद काशीपुरी, अमीन जसपुरी, इंजीनियर मोहम्मद इरफ़ान हमीद, फ़ुरक़ान अहमद ख़लिश और नक़ी अनवर साहब के नाम शामिल किये जा सकते हैं। इनके अलावा बैनुल-अक़वामी नाज़िम-ए-मुशायरा जनाब मंसूर उस्मानी, मोईन शादाब, तैय्यब आज़ाद और अज़हर शकील साहब आपकी शाइरी से बेहद मुतास्सिर होने वाले शु’अरा हज़रात हैं। ग़ज़ल ख़्वानी में आपका एक मुनफ़रिद अंदाज़ था। आप अपने तरन्नुम और बुलंद आवाज़ से महफ़िल में समां बाँध दिया करते थे। आपकी इल्मी व अदबी ख़िदमात के ऐतराफ़ में नवचेतना कल्चरल सोसाइटी काशीपुर की जानिब से शेर-ओ-शायरी के मैदान में मुनफ़रिद ख़िदमात के लिए "काशीपुर गौरव" के एज़ाज़ से नवाज़ा जा चुका है। 

मोहतरम जनाब अहमरकाशीपुरी ज़ाती ज़िंदगी में मिज़ाज के सख़्त लेकिन उसूल पसंद इंसान थे। आपने पूरी ज़िंदगी बड़ी मेहनत और ईमानदारी से गुज़ारी। आप समाजी रिश्तों को जोड़ने में यक़ीन रखते थे। आप मुआशरे की उमर दराज़ शख़्सियतों में से एक थे, इसलिए आपकी इज़्ज़त और अहतराम में कभी कोई कमी नहीं रही। हिब्बुल-वतनी का जज़्बा आपमें बचपन से ही था, इसलिए आप वालिद-ए-मोहतरम और पंडित गोविंद बल्लभ पंत जी के साथ कई बार आज़ादी की तहरीक में शामिल हुए। आज़ादी के बाद आपने हिंदुस्तान में रहना पसंद किया और इसी को अपना मादर-ए-वतन समझा। आपकी ज़िंदगी में एक वक़्त ऐसा भी आया जब ज़माने ने आपको तन्हा छोड़ दिया। 1972 में जंगलात की ठेकेदारी में आपको बहुत बड़ा नुक़सान हुआ, जिसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि आपकी सारी सरमाया कारी ज़ाया हो गई और आप ज़माने के मक़रूज़ हो गए लेकिन आपने हिम्मत नहीं हारी बल्कि तहम्मुल और ज़हानतदारी से काम लिया। कुछ हमदर्दों और अज़ीज़ों की मदद से कारोबार दोबारा क़ायम किया और किसी तरह शहर में साइकिल पेंटिंग और मरम्मत की एक वर्कशॉप का आग़ाज़ किया। आपने साइकिलों की पेंटिंग के लिए बाक़ायदा एक प्लांट लगाया। काशीपुर और इसके अतराफ़ यह पहला प्लांट था जहाँ साइकिलों पर स्टोविंग कलर किया जाता था। इस काम से आपको ख़ूब शोहरत मिली, जिसके नतीजे में "मुबारक हुसैन साईकिल वाले" का लक़ब आपकी पहचान बन गई।

आप एक हुनरमंद इंसान थे जिसे क़ुदरत ने भरपूर सलाहियतों से नवाज़ा था। आप मशीनरी और उसकी कारकर्दगी की गहरी समझ रखते थे। आपने ज़िंदगी भर मशीनरी पर बहुत काम किए हैं और उनमें कई तरामीम कीं, आपने ही बहुत पहले पेट्रोल जेनरेटर के डिज़ाइन में कुछ तबदीली करके उसे केरोसीन से चलाने का कारनामा अंजाम दिया। आपने क़ौमी इदारों और क़ौम की फ़लाह-ओ-बहबूद के लिए काफ़ी जद्दोजहद की, मोहल्ला अली खाँ काशीपुर में वाक़े क़दीमी इदारा शम्स-उल-उलूम में आप एक लंबे वक़्त तक ख़ाज़िन के ओहदे पर ख़िदमात अंजाम देते रहे। आपने इदारे के निज़ाम में बहुत से सुधार किए। आपसे पहले इस इदारे में आमद-ओ-ख़र्च का कोई तरीका-ए-कार नहीं था। आपने हिसाब-किताब का सारा निज़ाम बैंक की मार्फ़त कराने की शुरुआत की। इस भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में आप अपनी सेहत का पूरा ख़याल रखा करते थे। वॉलीबॉल खेलना आपका शौक़ था। आप वॉलीबॉल के एक बेहतरीन खिलाड़ी रहे हैं, साथ ही आप बाक़ायदा इस खेल की इलाक़ाई टूर्नामेंट का अहतमाम कराया करते थे। आप मौसीकी की भी गहरी समझ रखते थे। ग़ज़ल सुनना आपको बहुत पसंद था, गुलाम अली और मेंहदी हसन आपके पसंदीदा गुलूकार थे, इसके अलावा गीत गुनगुनाना और बांसुरी बजाना भी आपका मशग़ला रहा है।

आपने पूरी ज़िंदगी बड़ी मेहनत-ओ-मशक़्कत, सादगी और ईमानदारी से गुज़ारी, तंगदस्त ज़िंदगी में बड़ी दुश्वारियों का सामना करना पड़ा, परेशानियों और दुश्वारियों में आपकी अहलिया मोहतरमा आपके शाना-बशाना रहीं। आपकी अहलिया मोहतरमा का नाम अनवरी बेगम था, जो 31 जनवरी 2010 को आपका साथ छोड़कर इस दुनिया से रुख़सत हो गईं। आपके छः बेटे और दो बेटियां हुईं। समाजी और घरेलू ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ आपने बच्चों की तालीम-ओ-तर्बियत का पूरा ख़याल रखा। आपकी तर्बियत का ही नतीजा है कि आपके सभी बच्चे कारोबारी और मआशी एतबार से आज एक बेहतरीन ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। आपने अपनी ज़िंदगी में पोते-पोतियाँ, पड़पोते-पड़पोतियाँ और नवासे-नवासियों को देखा। कहने का मक़सद यह है कि आप एक मशहूर शायर होने के साथ-साथ क़ाबिल, ईमानदार, मेहनती, कामयाब, इज़्ज़तदार और अपने बच्चों पर शफक़त रखने वाले एक नेक दिल इंसान थे।

उम्र भर उर्दू अदब की ख़िदमत करने वाले, उर्दू, हिंदी, अंग्रेज़ी, अरबी और फ़ारसी ज़बानों पर उबूर रखने वाले बुज़ुर्ग शायर मोहतरम जनाब अहमरकाशीपुरी 20 जुलाई 2024 को 92 साला बेहतरीन ज़िंदगी गुज़ारने के बाद दुनिया-ए-फ़ानी से दुनिया-ए-हक़ीक़ी की जानिब हिजरत फ़रमा गए और अपने पीछे एक भरा-पूरा ख़ानदान, अपने मुशाहिदात-ओ-तजुर्बात और ज़िंदगी भर की जमा पूंजी यानी अपनी ग़ज़लों का ज़ख़ीरा छोड़ गए। आपकी अदबी ख़िदमात रहती दुनिया तक याद रखी जाएंगी।

आपके कलाम को यकजा करने और कंपोज़िटिंग करने में बड़ी जॉंफ़िशानी की गई है और कलाम को 'उसका तसव्वुर' नाम से शाया कराया गया है। इस किताब को अमली जामा पहनाने के लिए मैं अपने बड़े भाई जनाब इक़बाल अदीब काशीपुरी, जनाब प्रोफेसर आसिफ हुसैन और जनाब अमीन जसपुरी साहब का मशकूर हूँ। इन्‍तख़ाब उसका तसव्‍वुरको 'माई बुक सिलेक्ट पब्लिकेशन' की जानिब से उर्दू और हिंदी में शाया किया गया है, जो 'अमेज़न इंडिया' पर दस्तियाब है।

इन्तख़ाब का यह शुमारा हिन्दी पाठकों को ध्यान में रखते हुए पेश किया जा रहा है जिसमें सहूलत के लिहाज़ से हर ग़ज़ल के आख़िर में मुश्किल अल्फाज़ के मानी दिये गये हैं। चूँकी कोई भी अमल आख़िरी नहीं होता उसमे तरमीम की गुंजाईज हमेशा बनी रहती है लिहाज़ा आप सभी हज़रात से गुज़ारिश है कि इस इन्तख़ाब को और बेहतर बनाने के लिए अपने नेक मश्‍वरों से नवाज़ें। मुझे उम्मीद ही नहीं बल्कि पूरा यक़ीन है कि आप इस अदना सी कोशिश को ज़रूर सराहेंगे। आपकी नेक दुआओं का मुन्तज़िर।


संकलक

मौ0 जलीस सिद्दीक़ी

अल्ली खाँ काशीपुर

ऊ0सि0न0 उत्तराखण्ड।



‘’अहमरसाहब का कलाम - दिली जज्‍़बात की फरावानी’’

            जनाब ‘अहमर’ काशीपुरी से में एक ज़माने से वाक़िफ़ हूँ। वो मेरे लिए बड़ी मोहतरम शख़्सियत हैं। एक बुजु़र्ग हस्ती और उम्र के फ़र्क़ के सबब ही नहीं बल्के उनकी इल्मी क़ाबलियत के बाइस उनसे हर मुलाक़ात पर मैंने उनकी ताज़ीमो अदब को मलहूज़ रखा और उन्हें निहायत शरीफु उन्नफ्स, ख़लीक और मिलनसार, और अपने बच्चों के अहबाब पर निहायत शफ़क़त लुटाने वाले हलीमुत्तबा शख़्स के तौर पर जाना है। मुझे उनकी कु़रबतें तो नसीब नहीं रहीं लेकिन उनके अदब का सेहतमन्द ज़ौक़ मेरे लिए हमेशा उनकी ज़ात में कशिश का बाइस बना रहा है। मुझे महसूस हुआ के वो दोहरी शख़्सियत के मालिक नहीं है। शीरीं ज़बाँ और मुन्कि‍सर-मिज़ाज, ख़लीक़ और मिलनसार होने के नाते ख़ाकसार ही क्या सैकड़ों लोग उनके मद्दाह और गिरवीदा हैं।

प्रोफेसर रशीद अहमद सिद्दीकी मरहूम, शाइरी की वज़ाहत करते हुए शेअरियत के बारे में तहरीर फ़रमाते हैं, ‘‘यह एक ज़ौक़, एक विज्दान या एक क़िस्म का ज़हनी मीलान है। जिसका बराहेरास्त तअल्लुक इन्सानियत से है और इस विज्दान की सही और दिल्कश तर्जुमानी इस अन्दाज़ से करना के तसव्वुर और तसवीर में बेश अज़ बेश मनासबत हो, शाइरी है’’।

वाक़ई शाइरी के इस वसीअ मफ्हूम के दायरे में हर इन्सानी फेअल आ जाता है। लेकिन शाइरी की हदबन्दी नहीं की जा सकती है। मैकाले ने शाइरी के मैदान को इस क़दर वसीअ बताया है कि बुत तराशी, मुसव्वरी और नाटक यह तीनों फ़न इसकी वुस्अत और मेआरो मरतबा को नहीं पहुंच सकते। क्योंकी आखि़रूज़्ज़िक्र तीनों फ़नूने लतीफा किसी न किसी सूरत माद्दी अश्या की मरहूने मिन्नत हैं जबकि शाइरी माद्दी अश्या के इस्तेमाल से बालातर और मावरा है। लिहाज़ा फ़नूने लतीफा में तख्‍़लीके अदब सरे फ़हरिस्त है।

            उर्दू शाइरी में भी प्रोफेसर रशीद अहमद सिद्दीकी मरहूम ने ग़ज़ल को ‘‘उर्दू शाइरी की आबरू’’ क़रार दिया है। फैज़ अहमद फैज़, मरहूम के बक़ौल भी ग़ज़ल अपनी सलाहियतों के एअतबार से तख्‍़सीस रखती है। वो पाबन्दियाँ जो ग़ज़ल को पेश आती हैं उन्हें नियाहत ज़रूरी कहा जा सकता है लेकिन उन्हें मसरफ़ में लाना तो शाइर की ज़िम्मेदारी है। नज़्म में आज़ादी भी ज़्यादा है और बराहे-रास्त बात करने का मौक़ा भी है, लेकिन बिल्वास्ता इज़हार के लिए कोई सिन्फे सुख़न मौजूँ हो सकती है तो वो ग़ज़ल ही है’’ और मौलाना सफी लखनवी ने शाइरी की तारीफ़ एक शेअर में नज़्म करते हुए कहा था।

शाइरी क्या है, दिली जज़्बात का इज़हार है

दिल अगर बेकार है, तो शाइरी बेकार है

            और ‘अहमर’ साहब के कलाम में दिली जज़्बात की फ़रावानी वाफ़र मिक़दार में मौजूद है।

शहर से दूर जो टूटी हुई तअमीरें हैं

अपनी रूदाद सुनाती हुई तस्वीरें हैं


वो कहाँ तलक न देखे तेरे जल्वहाय रंगीं

तेरा हुस्न दे रहा है जिसे दावते नज़ारा


हम खुद तो दिलो जाँ से गुज़र जायेंगे लेकिन

दस्तार3 बुज़ुर्गों की न नीलाम करेंगे


मैं आँसुओं के समन्दर के पास बैठा हूँ

करे न फिक्र कोई मेरी तिश्‍नगी के लिए


रात हम से ही न काटी गई तन्हाई की

तेरे ग़म ने तो बड़ी हौसला अफ़ज़ाई की


रोशनी बढ़ती रहेगी जो इसी रफ्तार से

आदमी एक रोज़ मेहरूमे-नज़र हो जायेगा


हर चन्द नग़मा-सन्ज, ग़ज़ल-खुवाँ है ज़िन्दगी

ताहम बड़ी उदासो-परेशाँ है ज़िन्दगी


तकमील के मुक़ाम से मेहरूम हैं हुनूज़

जैसे किसी ग़रीब का अरमाँ है ज़िन्दगी


अहमर’ साहब का सारा कलाम चीदा व चुनीदा है। उनके कलाम के मुताले से मालूम होता है कि वो फ़न की नफासत और सलीका मन्दी का बड़ा बालिग़ शऊर रखते हैं। उनकी ज़बान शुस्ता और मंझी हुई है। किसी भी ग़ज़ल का कोई भी शेअर उठा लीजिए वो बड़ी मअना आफ़रीनी से पुर मिलेगा। उनकी शाइरी की बड़ी खूबी अवामी ज़बान को सलीक़ा मन्दी से पेश करके उसको वक़ार अता करना है। ‘अहमर’ साहब लखनऊ देहली स्कूलों के दरमियाँ रामपुर स्कूल के क़रीब यानि मुरादाबाद के रंगे-तग़ज़्ज़ुल की इत्तबा करते हैं। मगर कुछ कलाम बिल्कुल रामपुर स्कूल की मखसूस ज़बान के हुस्न की नुमाइन्दगी करता है। इस ख्याल को तकवियत उनके हल्का-ए-अहबाब में शामिल उन शेअरों की नुमाइन्दगी करने वाली माअरूफ़ शख़्सियत की मौजूदगी से भी मिलती है। मसलन रईस रामपुरी और गौहर उस्मानी मुरादबादी से उनके बड़े और गहरे मरासिम रहे हैं।

उनके यहाँ क़दीम किलासिकल शाइरी तो है लेकिन ऐसा नहीं कि उनके यहाँ नए रूज्हानात का असर कम है। जिन्हें शेअर के क़ालिब में उतारने का उनका अपना मख़्सूस और मुन्फरिद अन्दाज़ और बात कहने का अपना उसलूब है। इसके सबब उनकी ग़ज़लों की ज़बान के हुस्न और बयान की लताफ़त में एक अजीब और जुदागाना दिलकशी पैदा हो गई है। ‘अहमर’ साहब ने अखलाक़ी मज़ामीन बड़ी कसरत से नज़्म किए हैं।

कुछ मिसालें देखें।

अपनी ख़ुश-वज़्-ई पे शर्मिन्दा हुआ जब देखा

मेरे अतराफ़ में इन्सान हैं उर्यां कितने


जाहो-हश्मत, शानों-शौक़त, इज़्ज़तो-नामो-नमूद

हेच हैं सब कुछ बुज़ुर्गों की दुआ के सामने


ख़ताऐं पहले भी होती रही हैं दुनिया में

बस अब ख़ताओं पे ‘अहमर’ नदामतें कम हैं


करम का बन्द दरवाज़ा नदामत4 खोल देती है

ख़ताओ पर मुआफी अश्क़-अफ्शानी से मिलती है


बदन से खींच ली जाती है मामूली ख़ता पर भी

जो खि़ल्‍अत इल्तफाते-ज़िल्ले-सुब्हानी से मिलती है

            लेकिन उनके कलाम उनके ज़ौक़े तसौव्वुफ़ ने भी निखारा है। जिसकी ताईद में यहाँ चन्द अश्‍आर पेश किये जाते हैं।

रहे-इश्क़ से गुज़रना मेरे बस की बात कब थी

तेरी आरजू़ ने लेकिन मुझे दे दिया सहारा


एक मन्ज़िल पे न ठेहरा दिल सीमाब-सिफ़त

आए कितने ही मुक़ामात ठहरने के लिए

            कुछ मेहफिलों में ‘अहमर’ साहब का कलाम सुनने का मुझे इत्तफाक़ हुआ है। मैंने महसूस किया कि वो हुस्न का बहुत लतीफ़ और नाज़ुक एहसास रखते हैं और उनकी तबीअत में सिर्फ बाँकपन ही से नहीं बल्की बडी़ ख़याल-अंगेज़ केफ़यतात से बहरावर है। जब वो फिक्र की गहराईयों में डूबते हैं तो रूहानी ज़ौक़, अश्‍आर में ढल कर अपने जल्वे बिखेरता है। उनका हुस्ने-बयान, ख़याल और इन्सानी जज़्बात की ऐसी नादिर तस्वीरकशी कर देता है जो सिर्फ क़ल्बी जज़्बात की अ़क्कास ही नहीं होती बल्की सामईन या क़ारी के ज़हन पर वही असरात मुरत्तब कर देता है जो कैफियत किसी तजुर्बे से गुज़रने पर या किसी मन्ज़र को देखकर बज़ाते खुद उनके दिलों-ज़हन पर तारी हुई होगी। वो जिस मोज़ूअ को भी नौके क़लम से उजागर करते हैं इसके बिल्कुल नादीदा पहलु और अफ़कारों-तख़य्युलात से नए गौशे उजागर कर देते हैं और रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में एक आम से सीधे सादे नज़र आने वाले शख़्स से बिल्कुल अलग एक फ़लसफी की मुफ़क्कि‍राना शान हमें देखने को मिलती है। हमें बहर सूरत एअतराफ़ करना पड़ता है कि ख़याल और मानी का जादू जगाने में ‘अहमर’ साहब को मल्का हासिल है। ऐसे अश्‍आर का नमूना भी मुलाहिज़ा फ़रमाऐं।

दिले-बशर के जो एक मन्ज़िले मुहब्बत है

यहीं से राह निकलती है दुश्मनी के लिए

            अहमर’ काशीपुरी को फारसी से गहरा श़ग़फ़ रहा है इस लिए उनके यहाँ फारसी शाइरी का हुस्न और उसकी ग़नाइयत बदर्जा-अतम मौजूद है। मौहब्बत का जज़्बा उनके यहाँ मौजे मारता हुआ नज़र आता है। उन्होने जो कुछ कहा है, ख़ूब सोच समझ कर कहा है, उनकी ज़बान साफ़ सुथरी, सादा लेकिन बरजस्तगी सलासत और रवानी लिए हुए बड़ी संजीदा और शुस्ता है और उनके अपने मिज़ाज की तर्जुमान है वो समाज के जिस तब्क़े से तअल्लुक़ रखते हैं उसकी झलक उनके तर्जे़-बयान में नुमाया है। मस्लन

किसी को सिर्फ तसव्वुर ही पर क़नाअत है

किसी को ख़्वाहिशे बोसो-कनार बाक़ी है


फूलों की जुस्तजू में वो मन्ज़िल भी आई है

काँटो पे भी किया है गुज़ारा कभी-कभी


हरम है या है तेरा नक़्शे-पा ख़ुदा जाने

मेरी जबीं का मुक़द्दर है क्या ख़ुदा जाने


तुम्हारे हाथ तो लगते है सुर्ख़ सुर्ख़ मगर

यह ख़ूने दिल है के रंगे-हिना ख़ुदा जाने


इन्सान के बस में नहीं यादों को भुलाना

हंगामे-मसर्रत में भी आजाते हैं ग़म याद


ज़बाँ से निकली हुई बात सब समझते हैं

जो दिल की बात को समझे वो दिलरुबा तू है


ना-तमामों के तसर्रुफ़ में हैं असबाब तमाम

हाथ पर हाथ रखे अहले-हुनर बैठे हैं


मन्ज़िले-दार तलक अहले जुनूँ जा पहुँचे

अहले इदराक ख़ुदा जाने किधर बैठे हैं


मुश्किलों से पुर-यक़ीनन था, मगर अच्छा लगा

ज़िन्दगी तेरे बयाबाँ का सफ़र अच्छा लगा

 

सिर्फ उस को ही जलाया सारी बस्ती छोड़कर

यानी मेरे दुश्मनों को मेरा घर अच्छा लगा


उस की महफिल में कई अहले-हुनर भी थे मगर

मेरी क़िस्मत उस को मुझसा बेहुनर अच्छा लगा


बोझ तो ग़म का मुसलसल ही मेरे दिल पर रहा

फिर भी कल से आज का दिन निस्बतन बेहतर रहा


जिस को ढ़ोते ढ़ोते मेरी पुश्त दोहरी हो गई

मेरे शानों पर हमेशा उम्र का पत्थर रहा


मैं जो इन्सान हूँ तो ठोकर न लगाओ मुझको

हाँ जो पत्थर हूँ तो रस्ते से हटाओ मुझको


मुझ को अन्दाज़ा नहीं अपनी ज़बों हाली का

दोस्तों तुम ही मेरे ज़ख़्म गिनाओ मुझको


रोशनी बढ़ती रहेगी जो इसी रफ्तार से

आदमी एक रोज़ मेहरूमे-नज़र हो जायेगा


मैं मुसाफिर हूँ मगर फिर भी है मुझमें यह कमाल

जिस जगह पर बैठ जाऊँगा वो घर हो जायगा


मैं फिर भी अपने अहद का तारीख़-साज़ हूँ

हालाँकी मेरे हाथ में लोहो-क़लम नहीं


कैसी अजीब शय है यह आँखों की तिश्‍नगी

तुम रूबरु  हो और मेरा शौक़ कम नहीं


क्यों दिलाते हो मुझे तिश्‍ना-लबी का अहसास

मेरी आँखें भी छलकते हुए पैमाने हैं


मेरे मन्सब की तरक़्क़ी का बहाना लेकर

दोस्तों मेरी जगह से न उठाओ मुझको

            अमूमन वो सख़्त ज़मीनों का इन्तेख़ाब शेअर गोई के लिए नहीं करते लेकिन जब भी कोई संगलाख ज़मीन किसी चेलेन्ज की सूरत में उनके सामने आती है तो उनको भी बड़ी ज़रख़ेज़ बना देते हैं और ऐसे शेअर निकालते हैं कि उनकी इल्मियत और फ़नेशेअर-गोई और ज़ूद-गोई का ऐतराफ़ करने के सिवा चारा नज़र नहीं आता। उनके अश्‍आर की यह ख़ूबी क़ाबिले ज़िक्र है कि वो रदीफों के फ़नकाराना इस्तमाल का हक़ अदा कर देते हैं। यक़ीनन उनकी फ़न्नी महारत को तस्लीम करना पड़ता है। क़ारईन के ज़ौक़े सलीम के लिए चन्द नमूने पेश किये जाते हैं।

तेरे मरीज़े-इश्क़ का दम टूटने को है

एक ऐक आरज़ू का भरम टूटने को है

कुछ देर और हौस्ला-ए-ज़ब्ते ग़म रखो

ऐ ग़म-ज़दो कमाने-सितम टूटने को है


अन्जाम के क़रीब है रूदादे-ज़िन्दगी

बुझने को है चिराग़ क़लम टूटने को है


बदन से खींच ली जाती है मामूली ख़ता पर भी

जो खि़ल्‍अत इल्तफाते-ज़िल्ले-सुब्हानी से मिलती है

            वो हसीनों की शान में कभी लन्तरानियाँ पेश करते नज़र नहीं आते हैं, उनके यहाँ मुहब्बत का जज़्बा तो कारफ़रमा है लेकिन किसी ख़याली महबूब की नाज़ बरदारि्यों और उसकी क़सीदा ख़्वानी से वो परहेज़ ही करते हैं। इसकी जगह उन्होंने शराफ़त हमदर्दी और इख़लाक़ियात और इन्सानियत को अपना शिआ़र बनाया है। वो कहीं भी ऐसे अल्फाज़ या तराकीब इस्तमाल नहीं करते जो उनके शायाने शान न हो उनकी ज़बान पढे़ लिखे और एक संजीदा शख़्स की ज़बान है। इसके साथ उनके ख़यालात व अफ़कार में पाकी और नुज़्हत है लिहाज़ा उनकी शाइरी भी उनके ज़हन की तरह अदब की मोहतरम हदों की पासदार है।

            उनके नज़दीक क़ल्बो रूह का सुकून ही हक़ीक़ी आसूदगी अता कर सकता है। माद्दी सुकून या जिस्मानी सुकून, कोई सुकून नहीं है इसी लिए वो दिली रिश्तों को उस्तवार करने की पुरज़ोर अपील करते हुए कहते हैं।

 

कोई तिस्‍कीन दिलोरूह की सूरत भी करो

तन का आराम ही आराम नहीं है यारो

            उनका कलाम दिलो ज़हन को सुरूरो इन्बिसात ही नहीं बख़्शता बल्कि तामीरी रूज्हानात को मुसलसल फ़रोग़ देता है। इख़लाक़ी पस्तियों और मुख़तलिफ़ मुबाहिसात पर शाइरी के तवस्सुल से इज़हारे ख़यालात किया गया है। उन्होंने जिस मोजू़अ को भी उठाया है वो तवज्जो तलब है। ख़्वाह वो बाहमी रक़ाबतें हों, मआ़शी मसाइल हों या मुआशरत से मुतल्लिक़ इन्सानी रवय्यों के मुख़तलिफ़ पहलू हों। बहर हाल वो इन्सानी रफ़अतों और अख़लाक़ी बुलन्दियों को क़ायम करना चाहते हैं।

 

 

मश्‍रब को आश्‍ती के करो आम दोस्तो

अब यह तिलस्मे देरो-हरम टूटने को है

(

न आया आज भी कोई मिज़ाज-पुर्सी1 को

मेरे ख़याल में लोगों को फुरसतें कम हैं

(

ख़ताऐं पहले भी होती रही हैं दुनिया में

बस अब ख़ताओं पे ‘अहमर’ नदामतें कम हैं

(

            इन्सानी मिज़ाज और फितरत की जुम्ला कैफियात का जमाली जायज़ा मुश्किल अम्र है। मगर चन्द नुमाया जज़्बात का अहाता ज़रूर किया जा सकता है। जिनमें जज़्बा-ए-ग़म निहायत अहमियत का हामिल और इन्सानी ज़िन्दगी पर अपने गहरे असरात मुरत्तब करने वाला जज़्बा है। यह जज़्बा ‘अहमर’ काशीपुरी के कलाम में निहायत अहमियत का हामिल है। ‘अहमर’ साहब ग़म को हलाकत का बाइस तस्‍लीम नहीं करते बल्कि इन्सानी ज़िन्दगी में इसके ताअमीरी और मुसबत पहलुओं को निगाह में रखते हैं और ज़िन्दगी के लिए बहुत ज़रूरी मानते हैं, जिसके सबब उनके यहाँ ग़म एक मुहतरम मुक़ाम रखता है। जैसे अंधेरे के बग़ैर रोशनी का तसव्वुर नामुम्किन है ऐसे ही ग़म के बग़ैर खुशी की वज़ाहत भी नहीं की जा सकती और ना ही ग़म की। अदम एहसास से, खुशी से लुत्फ़ अन्दोज़ हुआ जा सकता है। लिहाज़ा ग़म की तौक़ीर ज़रूरी है। इस लिए निशातो ग़म की कैफियात इन्सान को लाज़िमो मलज़ूम की हैसियत रखती है। ‘अहमर’ साहब इस मुहब्बत को, मुहब्बत का मज़ाक़ गिर्दान्ते हैं जिस में ग़म की चाश्नी न हो। आमतौर पर सभी इन्सान ग़म की कैफियात से दामन बचाते हैं और यह अहतियात उसे ग़म की अहमियत समझने से दूर कर देती है। लिहाज़ा इन्सान ज़िन्दगी में ग़म से हुज़ उठाने के हुनर से महरूम होकर रह जाता है। ग़म इन्सान को उसके मसाइल की हक़ीक़त को समझने, रिश्तों की नज़ाकत को समझने और उनका एहसास मुतअल्लिकीन को कराने, तरबो इन्बिसात के मयारे अहमियत को समझने, मसाइल से नबुर्दआज़मा होने के लिए अपनी अह्लियत और क़ुव्वते इस्‍तेदाद को समझने में मुआविन होते हैं।

            ग़म की अहमियत और तौजि़हात को ‘अहमर’ साहब ने बड़ी तफ़सील से नज़्म किया है। ग़मो से मुतअल्लिक मैंने कोई इबारत आराई अपनी जानिब से नहीं की है। यह जुमला तफ़सीलात ‘अहमर’ साहब के कलाम में मौजूद हैं। बस मेरा कारनामा यह है कि उनके ग़म के मफ़ाहीम पर मब्नी अश्‍आर को मैंने एक तसल्सुल के साथ मज़मून में मुनज़बित कर दिया है।

अपनी ज़िन्दगी में जो इन्सान ग़म और खुशी का ऐसा तजज़िया करने का इदराक रखता हो, यक़ीनन वो कामरान ज़िन्दगी गुज़ार सकता है। और उनसे बहुत कुछ सीखा और समझा जा सकता है इस बात का अहसास ‘अहमर’ साहब को भी है। क्योंकी वो ग़मे दुनिया, ग़मे मौहब्बत, ग़मे ज़माना, ग़मे तमन्ना, ग़मे जुदाई यानी ग़म की गौ-न-गौं सूरतों से कामरान गुज़र चुके हैं। लिहाज़ा वो ग़म ज़दा लोगों को खुली दावत देते है कि इस हुनर में मल्का हासिल करने का फ़न उनसे सीख सकते हैं। और उनकी होसला अफ़ज़ाई करते हुए उन लोगों को खुशक़िस्मत बताते हैं जिनको ग़म जैसी दौलत नसीब है, और वो ग़म को हिक़ारत से देखने वालों को आगाह करते हुए कहते हैं।

उस का तरब से लुत्फ उठाना मुहाल है

जिस शख़्स की निगाह में तौक़ीरे-ग़म नहीं

(

मज़ा हासिल न होगा ज़िन्दगी का

जो ‘अहमर’ ज़िन्दगी में ग़म न होंगे

हर कोई उस से हो महज़ूज़ यह नामुम्किन है

नश्शा-ए-बादा-ए-ग़म आम नहीं है यारो

  (

दरख़्ते-सब्ज़ का साया उन्हीं को मिलता है

जो अपने दिल में ग़मे-आफ़ताब रखते हैं

(

बडे़ नसीब से मिलता है ग़म मुहब्बत का

हर एक शख़्स की क़िस्मत में यह खुशी भी नहीं

(

लुत्फ-अन्दोज़ हुआ जाता है कैसे ग़म से

सीखना है यह हुनर जिस को वो सीखे हमसे

(

ग़म ही काफी है मेरी तिस्कीने-ख़ातिर के लिए

मेरे आगे से मओ-सागर उठा ले जाइये

(

उनके बेश्तर कलाम में असरी मसाइल का बयान हमें जा-ब-जा नज़र आता है। खुसूसन इस दौर में इन्सानियत और शराफ़त की बदलती हुई इक़दार से ‘अहमर’ साहब अक्सर ग़ैर मुतमइन नज़र आते हैं।

ज़िन्दगी भूख से बेकैफ़ अगर होती है

चांदनी रात भी आमादा-ए-शर होती है

(

ये तो किस मुँह से कहें मालिके-दुनिया तुझ से

हम ग़रीबो पे नहीं तेरी नज़र होती है

(

हज़ार बार गिरे बर्क़े-मश्क़े-ज़ौरो-सितम

मगर हम अपने चमन से निकल नहीं सकते

आदावियत के साथ साथ इस्लाहे मआशरत, यकजहती, क़ौमी इत्तेहाद, हुब्बुलवतनी और मनाज़िरे फितरत को भी उनके यहाँ नुमाया मुक़ाम हासिल है।

न मन्सब से न दौलत की फ़रावानी से मिलती है

जो इज़्ज़त आदमी को ख़न्दा-पेशानी से मिलती है

(

ज़िन्दगी के गौना गौ तजुरबात ने बड़ा मोहतात बना दिया है। लिहाज़ा वो पहली मुलाक़ात में किसी से खुलकर नहीं मिलते लेकिन एक ऐसा ताअस्सुर ज़रूर छोड़ देते हैं कि हर इन्सान उनसे दुबारा मुलाकात का मुतमन्नी ज़रूर रहता है। अपने तजुरबात और मुशाहिदात की बिना पर उनके क़ौलो अमल में तज़ाद नज़र नहीं आता। लिहाज़ा वो अपने मिज़ाज की कैफियत से हमको आगाह करते हुए कहते है।

मैं दोस्तों से भी मोहतात हो के मिलता हूँ

बड़ा शऊर दिया दुश्मनों के डर ने मुझे

(

वो हाफिज़, शैख सादी, ग़ालिब, इक़बाल, मीर को सद-लायक़-ए-अहतराम समझते हैं। जिससे अन्दाज़ा होता है कि उन्होने फारसी व उर्दू के बाकमाल शुअरा के फ़न को परखा और समझा है और इसी की इत्तेबा को अपने लिए बाइसे इफ्तेख़ार समझा है। ‘अहमर’ साहब ने ग़ालिब का मुताअला बड़ी बारीक बीनी से किया है। वो उनकी अज़मत के मोअतरिफ़ ही नहीं बल्कि उनके कई मअरूफ़ अश्‍आर के मफाहीम को अपने अन्दाज़ेनज़र के तहत नये रुख या ज़ावियों से पेश किया है ग़ालिब की कई ज़मीनों में ग़ज़ल कह कर अपने अकीदे का भी इज़हार किया है। ग़ालिब का सतही मुताअला रखने वाला कोई भी शख्स इसका अन्दाज़ा उनके इन अश्‍आर से कर सकता है।

ग़ालिबो-मीर के मन्सब को न पहुँचा कोई

यूँ तो लोगों ने बहुत क़ाफिया-पेमाई की

(

 

हम जिसे सहल समझते रहे ‘अहमर’ बरसों

आज मुश्किल है उसी काम का आसाँ होना

(

हो गई मजरूह खुद्दारी मेरी

ज़ख़्म क्या मिन्नत-कशे मरहम हुआ

(

चलती है थोड़ी दूर हर एक राहरो के साथ

अहमर’ यह गर्दे-राहगुज़र कुछ न कुछ तो है

(

इस मशीनी दौर की ज़िन्दगी में इन्फार्मेशीन टेक्नालोजी के साथ बेपनाह सुरअ़त से भागती दौड़ती ज़िन्दगी में अहदे-रफ्ता की वज़अदारियाँ,  रवादारियाँ, सहतमन्द इक़दार की पासदारियाँ और शफ़क़त लुटाते जुमलों की रूह को मुअत्तर करती महक उनके बेशतर अश्‍आर से फूट पड़ती है। तजुर्बात और मुशाहिदात का जो बेशकी़मत सारमाया उनकी रूह का जुज़्बेविलायन्फक बन चुका है, वो काफी अश्‍आर में ढ़ल कर नई नस्ल के लिए रोशनी और आगाही के दरवाज़े ही नहीं खोलता बल्कि आइन्दा नसलों के लिए भी तर्बियत की राह अस्तवार करता है। उनकी शाइरी के हर जमाली पहलू से लुत्फ अन्दोज़ होने के लिए उनकी शेअरी काईनात का सफ़र एक हसीन तर्जुर्बे तज्रबे से किसी सूरत कम नहीं।

मुझे बेहद ख़ुशी है कि मेरे उस्ताद और बाक़ामाल शायर जनाब अहमर काशीपुरी का यह दीवान बहुत जल्द उर्दू और हिंदी ज़बान में प्रकाशित होने जा रहा है। अहमर साहब के साहबज़ादे मोहम्मद जलीस सिद्दीक़ी की इस सच्ची तअलीफ़ को सराहते हुए क़ारियीने-कराम जनाब अहमर काशीपुरी की गज़लियात के इस मजमूए को अपने नुक्ता-ए-नज़र से परखने और समझने की कोशिश ज़रूर करेंगे। किताब "उसका तसव्वुर" यह यक़ीनन क़ारियीन में मकबूलियत हासिल करेगी।


                अमीन जसपुरी

                जसपुर, ऊधम सिंह नगर

  


 ‘‘चराग़ जो अभी रोशन है यानी - जनाब ‘अहमर’ काशीपुरी साहब’’

 

रात हम से ही न काटी गई तन्हाई की

तेरे ग़म ने तो बड़ी हौसला अफ़ज़ाई की

 

            दानिशवरों !! यह एक शेअर मोहतरम जनाब ‘अहमर’ काशीपुरी साहब के तअर्रुफ़ के लिए काफी है। यह शेअर बरसों पहले मोहतरम जनाब तुफैल चतुर्वेदी साहब ने और फिर ‘अहमर’ साहब के पोते मास्टर शारिक सिद्दीक़ी ने मुझे सुनाया और अस्सी बरस के इस मोअज्जिज़ और सादा लोह की एक तस्वीर मेरे दिलो ज़हन में रच बस गई, यानी फूल से पहले उसकी खुशबू मुझ तक पहुंची। मोहब्बतों का सफ़र जारी रहा और फोन पर उनसे बात करने का इत्तेफाक हासिल हुआ। रोशनी रोशनी होती है और लकीरों में असीर नहीं हो सकती लेकिन जिन ग़ज़लों को आप पढ़ने जा रहे हैं उन्हें यह रुतबा हासिल है कि वो जनाब मोहतरम ‘अहमर’ काशीपुरी की रमक और लम्स से लबरेज़ हैं बावजूद इस सच के कि शाइर बहर कैफ़ अपने बयान से ज़यादा कद आवर है।

            ग़ज़ल ने कई मरहले पार किये है। ज़बान, अदब और अवाम के, लेकिन इसकी मंज़िले मक़्सूद सदा से एक ही रही है और वो है साईमन का दिल, जिस ग़ज़ल की रसाई आवाम के दिलों तक है वो कामयाब है और इस पैमाने पर ‘अहमर’ साहब हमारे अहद के अन्य शायरों से आगे दिखाई पड़ते हैं।

 

वो झूट बोल के खुश हो रहा है होने दो

जो कह रहा है ग़मे ज़िन्दगी नहीं है उसे

(

शहर से दूर जो टूटी हुई तअमीरें हैं

अपनी रूदाद सुनाती हुई तस्वीरें हैं

(

मेरे अश्‍आर को अश्‍आर समझने वालो

यह मेरे ख़ून से लिक्खी हुई तहरीरें हैं

मैं हूँ वो रिन्द-बलानोश के मेरे ग़म में

रोयेंगे मिल के गले देरो-हरम मेरे बाद

(

मेरे दम तक यह तग़ाफुल है तुम्हारा यारो

बन के रह जाओगे तस्वीरे-अलम मेरे बाद

(

            नई नसलों के दिलो ज़हन में रिवायत की तस्वीर गैरज़रूरी रख़्ते-सफ़र की सूरत में रच बस गई है या जो मग़रिबी तालीम और कथित तरक्की पसन्द तरबियत ने रचाई बसाई है और इस तसवीर को वो बहर सूरत छोड़कर आगे बढ़ना चाहते है ऐसे में ‘अहमर’ साहब की ग़ज़ले एक बहुत मज़बूत दलील के साथ पेश की जा सकती हैं। वो रिवायती ज़बान और जदीदियत की एक ऐसी सन्धि रेखा पर खड़े हैं जहां उनका दौर उन्हें जदीद, और दौरे हाज़िर उन्हें आदर्श रिवायती शाइर के तौर पर तसलीम कर सकता है। उनकी आसान ज़बान ज़ेहन को किसी मशक्कत से बचाती है और दिल में सीधी उतरती है कमोबेश हर ग़ज़ल में एक से ज़्यादा शेअर आँख को ठहर जाने को मजबूर कर देता है। सादगी में पुरकारी और बेखुदी में ज़हानत और शाइस्तगी का पैकर बन कर उनकी ग़ज़लें अदब और आवाम के लिए एक खूबसूरत पेशकश हैं।

आपकी मुझ पर करम फ़रमाईयाँ

बन गईं मेरे लिए रुस्वाईयाँ

(

छोड़ दे ऐ दिल ख़्याले-वस्ले-यार

हाथ आती हैं कहीं परछाईयाँ

(

जिगर में ज़ख्म, नज़र में तलाश, दिल में उम्मीद

हम अपनी जान पे क्या-क्या अज़ाब रखते हैं

(

दरख़्ते-सब्ज़ का साया उन्हीं को मिलता है

जो अपने दिल में ग़मे-आफ़ताब रखते हैं

 ‘अहमर’ साहब के पसन्दीदा शाइर ग़ालिब हैं लेकिन उनका खुद का रंग ग़ालिब से मुख़्तलिफ़ होकर भी ग़ालिबाना हैं और मरहूम फैज़ अहमद फैज़ की नज़्मों की तरह उनके अश्‍आर तखय्युल की चाँदनी में पाठक के दिल को वो तिस्‍कीन देते हैं जो बच्चों को सुलाने के लिए परियों की कहानी देती है।

            ‘अहमर’ साहब नैसर्गिक शाइर हैं। उनकी शाइरी इस बात की तस्दीक करती है कि वो चाहें तो रोज़मर्रा का अपना सरापा ए इज़हार नस्र में नहीं अश्‍आर के मार्फत कर सकते हैं। उनकी शाइरी की ताक़त भी यही सादगी है और यही उनके बयान का सबसे अहम बिन्दू है कि भले ही उनक दौर के दीगर शायरों का बयान आज शायद अप्रसांगिक हो चुका हो लेकिन उनकी ग़ज़ल अपनी सादगी के चलते आज भी रोचक है और उसमें भरपूर कशिश है। ‘मुहब्‍बत और ज़िन्दगी का सफ़र’ ‘दोस्ती और हिज्र’ गुर्बत में सभी अपने अरूज के साथ उनकी ग़ज़लों में नुमाया होते हैं लेकिन उनकी सिरिश्त में तंज़ का शाइबा भी नहीं मिलता जो शाइर की कुशादा दिली की तशरीह है। कुल जमा शाइर की जो तस्वीर उनकी ग़ज़लों में सामने आती है वो एक सादालोह की तस्वीर है जिसके पास दिल जिगर और गुर्दा कमाल का है लेकिन उनका दिल इतना विशाल है कि जिस्म को कहीं भी चीरने पर दिल ही मिलता है। उनके लहजे में मश्‍वरा, इफ़रत में है और इसका सबब यह है कि उनकी ग़ज़लें उस समय कही गई जब समाइन को ध्यान में रखते हुए ग़ज़ल कही जाती थीं तथा सालिलाकी का तब प्रचलन नहीं था और तब की ग़ज़ल नज़्म के करीब नहीं थी लेकिन सबसे खूबसूरत पहलू यह है जो कि उन्हे अपने दौर से अलग करता है कि यह मश्वरे तख़य्युल की उपज नहीं है वरन सीधे उनके अहसास से आये हैं।

 

हवा मे उड़ते परिन्दों से प्यार मत करना

मुसाफिरों का कभी एअतबार मत करना

(

वो बात जिसको छुपाना हो अपने दुश्मन से

तो दोस्तों पे उसे आश्कार मत करना

            नव्वे से ऊपर इस सादालोह ने आज़ादी नाम की मस्लहत को ग़ौर से देखा परखा और भुगता है। उनका आसमान लहू रंग है जिसे उनकी हस्सास तबीअत ने गुलाबी करने की पूरी कोशिश की है लेकिन साँच को आँच नहीं के मुताबिक सच की आँच ग़ज़ल में कहीं मद्धम नहीं पड़ती है।

हर एक शख़्स यास का पैकर है आज भी

पहले की तरह ज़ीस्त सितमगर आज भी

(

कितने ही इन्क़लाब हुए रूनुमा8 मगर

बेचारगी बशर का मुक़द्दर है आज भी

(

अब से कही ज़्यादा थी महफूज़ ज़िन्दगी

जब आदमी के सर पे कोई सायबाँ न था

(

उस शहरे-आरज़ू के तसव्वुर5 में मिट गए

जिसकी कोई ज़मीन कोई आसमाँ न था

(

जहाँ में लोग बहुत हैं मुहब्बतें कम हैं

कहानियाँ हैं ज़्यादा हक़ीक़तें कम हैं

(

न आया आज भी कोई मिज़ाज-पुर्सी को

मेरे ख़याल में लोगों को फुरसतें कम हैं

            वक़्त का अलमीया नहीं बदला लेकिन अलमीये की शिद्दत बदल गई है। बेहद खूबसूरती से ‘अहमर’ साहब की ग़ज़ले दिलों को पत्थर में तब्दील हो जाने की कहानी सुनाती हैं। वक़्त की करवट ने जो सामाजिक और भावनात्मक परिर्वतन किये उनका दस्तावेज़ उनकी ग़ज़लों में कुछ इस खूबसूरती के साथ मिलता है कि पढ़ने वाला उनका बयान अपने साथ हम आहंग कर लेता है।

हादिसाते-रोज़ो-शब ने उस को पत्थर कर दिया

दरहक़ीक़त देने वाले ने दिया था दिल मुझे

हमारे पास दिले-दाग़दार बाक़ी है

ख़ुदा का शुक्र है एक ग़मगुसार2 बाक़ी है

(

तेज़ आंधी ने शमा दिल की बुझाई और फिर

मेरी तारीक-हक़ीक़त ने मुझे लूट लिया

(

            आज़ाद भारत की एक तस्वीर तो वो है जो सरकारी दावों और खोखले नारों से बनाई हुई तस्वीरों के मार्फत आवाम तक पहुंचती है जो चीखती है लेकिन कोई असर नहीं छोड़ती और एक तस्वीर वो भी है जो अहले नज़र इज़हार की पावन्दी या ज़हानत के दायरे में रह कर बनाते हैं, यह तस्वीर खामोशी की होती है जिसकी आवाज़ इतनी बुलन्द होती है कि सुन सके तो सियासत की समाअत बदर हो सकती है लेकिन हमारी बदक़िस्मती और खुद की खुशकिस्मती सियासत पहले से बहरी है लिहाज़ा उस पर फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन हर हस्सास तबीअत इन्सान इस आवाज़ को सुन सकता है और खुद के भीतर महसूस कर सकता है। यही आवाज़ शाइर की आवाज़ होती है।

ज़िन्दगी भूख से बेकैफ़ अगर होती है

चांदनी रात भी आमादा-ए-शर होती है

(

कसरते ग़म की इनायत से हमेशा ऐ दोस्त

आँखो-आँखो में हर एक शब की सहर होती है

(

            अहमर’ साहब शाइर है लिहाज़ा मुहब्‍बत ही उनकी दुनिया है। उन्के यहाँ उतने ही रंग हैं जितने रंग मुहब्‍बत के हो सकते हैं। उनकी ग़ज़लों में तवक़्क़ो, तग़ाफुल, चाँदनी, रोशनी, बेखुदी, तन्हाई सारे अल्फाज़ एक ही मरकज़ के गिर्द सिमट जाते हैं जिनका नाम मुहब्‍बत है। उनके यहाँ मुहब्‍बत वो पाकीज़ा शय है जिसको वो जाँविदानी सरहदों के पार खड़ा देखते है। उनके यहाँ मुहब्‍बत का ओहदा अन्य शायरों से अधिक ऊंचा है। महबूब का तग़ाफुल अदु की साजिश है, सितमगर के पास कोई वाजिब वज्हा होगी सितम की, और इस ख़याल से कि वो आये घर में हमारे खुदा की कु़दरत है, वस्ल का इम्कान भी उनको बेतर्तीब सा बना देता है। यह तख़य्युल ही नहीं, इज़हार ही नहीं, तालीम और तरबियत ही नहीं दरअस्ल उस इन्सान की ऊंचाई है जिसका नाम ‘अहमर’ काशीपुरी है।

किसी ने सोच समझ कर सितम किया होगा

मेरी वफाओं का शायद यही सिला होगा

वो वादा करके न आये तो कोई बात नहीं

सवाल यह है अगर आ गये तो क्या होगा

(

            इब्राहीम ज़ौक़, मोमिन, मीर, सभी के शेड्स उनकी ग़ज़लों में मिलते हैं लेकिन दाग़ इक़बाल और हफीज़ का रंग उनकी ग़ज़लों में लगभग नहीं या बेहद कम मिलता है। जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उनकी शाइरी मद्धम सुरों का आहंग है। यह शिल्हूट्स शेड्स की पेंटिंग नहीं है और नाही हुसैन हेब्बार का चित्र है वरन यह अमृता शेदगिल, रवि वर्मा या रवीन्द्रनाथ ठाकुर की पेंटिंग है जिसमें सिम्बल मआनी से साथ कोई ज़ाविया नहीं रखता वरन साफ़ सीधी बात कहता है। यह उस रूह की आवाज़ है जिसने दीवार की इबारतों और मक़्तल के सफ़र की दास्तान ऐसे लिख दी है कि जैसे वो इसके लिए पहले से तैयार था। और शाइरी उसका चुनाव नहीं वरन उसकी रूह की आवाज़ थी।

दिन है ढ़लने के लिए रात गुज़रने के लिए

जो भी शीराज़ा है आख़िर है बिखरने के लिए

(

ज़हन में उस का तसव्वुर है क़लम हाथ में है

शेअर बेताब है काग़ज़ पे उतरने के लिए

(

            शाइरी के जो प्रचलित अनासिर हैं वो उनकी ग़ज़लों में पूरी शिद्दत से मिलते हैं जैसे फ़ल्सफा, दोस्ती वगै़रा, लेकिन उनका इज़हार जोकि आबे-रवां जैसा है इतनी आसानी से समन्दर को अंजुरी में ले लेता है कि उनके फिक्रो-फ़न के आईनाखाने को स्कैनर से गुज़ारने का मन होता है। किसी कोहकन को मुश्ते ख़ाक के तलब नहीं होती, लेकिन शीरीं के पैकर में फिर क्या था?!! यह सवाल आज भी हमें लाजवाब कर देता है खुदा ऐसे इरफान का नाम जो हर जगह होकर दिखाई नहीं देता है। लिहाज़ा ‘अहमर’ साहब की ग़ज़लों में वो मोज़िज़ा कहाँ से आता है जो ग़ज़ल पढ़ने या सुन्ने के बाद दिलो ज़हन को अपने इख़्तियार में ले लेता है। इस सवाल की तलाश में तब्सरा निगारों का क़लम तादेर ठहर सकता है, लेकिन मेरे देखे इस सवाल का जवाब यही है कि जैसे डाली, पत्ती, खुश्बू और रंग को जोड़कर फूल नहीं बनाया जा सकता वैसे ही सच्चा शेअर शाइर की शिरिस्त से उपजता है न कि रियाज़ से, ‘अहमर’ साहब नैसर्गिक शाइर हैं इसलिये उनकी ग़ज़लों में यह असर किन अनासिर कि सबब है यह कहना मुश्किल है। लेकिन इस असर को महसूस करना सबसे आसान है।

वो मेरा राज़दार मेरा ग़मगुसार था

लेकिन मेरी तबीअते-नाज़ुक पे बार था

(

जो आज दुश्मनी पे मेरी कारबन्द है

कल मेरी दोस्ती के लिए बेक़रार था

(

            मासूमियत एक ऐसा गुण है जो उच्च जीवन मूल्यों में मालिक की मेहर के रूप में जाना और स्वीकार किया जाता है यह ईश्वरीय देन है। मासूमियत कोई खुद में पैदा नहीं कर सकता वरन यह किसी किसी में समष्टि के वरदान रूप में स्वतः ही होती है और उनके समकालीन समाज के लिए एक अनुपम निधि के सामान होती है। मासूमियत संत और शायरों में अपनी वृहत जीवन दृष्टि के चलते बाकी रह जाती है क्योंकि तृष्णा से उपजी मलिनता से उनकी चेतना अन्य लोगों से अपेक्षकृत मुक्त रहती है। यही मासूमियत संतों में अमर वचन कहलाती है और शायरों से याद रह जाने और दिल में उतर जाने वाले शेअर कहलवा देती है। ‘अहमर’ साहब पर खुदा की नियामत है कि उनमें नव्वे बरस की उम्र में भी मासूमियत बाकी रखी है। वो बेहद निश्छलता और बग़ैर किसी कारीगरी के इते सुन्दर अश्‍आर कह देते है कि यह शेअर दिल की गहराईयों में ऐसे उतरते चले जाते हैं जैसे घाटियों में झरनों का पानी उतरता चला जाता है।

मेरा अफ़साना ज़माने को सुनाया जाए

शर्त यह है के मेरा नाम न लाया जाए

(

मयकदा हमसे बहुत दूर नहीं है लेकिन

तिश्‍नगी का भी ज़रा लुत्फ उठाया जाए

(

मैं अपने घर से रहूँ दूर या रहूँ घर में

लिखी हुई है उदासी मेरे मुक़द्दर में

ख़याल बनके समाया है क्यों मेरे सर में

वो आदमी जो नहीं है मेरे मुक़द्दर में

(

हर एक हद्दे सितम से गुज़र रहा हूँ मैं

दुआ करो मेरे हक़ में के मर रहा हूँ मैं

(

जला रही है मुझे सुब्हो-शाम की आतिश

यह मेरा ज़र्फ के फिर भी निखर रहा हूँ मैं

(

आज़ादी के बाद भारत के मुस्लिम समाज की दास्ताँ समझना आसान नहीं है। इसके लिए आपको खुद मुसलमान बनना पडे़गा। जो यहां से जाना चाहते थे या जो जाने में समर्थ थे या जिन्हे जाना पड़ा वो पाकिस्तान चले गए, लेकिन जो नहीं जाना चाहते थे या या नहीं जा सके वो यहीं रहे और उन्होंने एक बदले हुए भारत में अपना अनुकूलन किया। आपकी क़ौम की आबादी जम्हूरियत में आपकी सियासी ताक़त का पैमाना होती है। इसलिए मुस्लिम समाज का राजनैतिक कद आज़ाद भारत में पहले जैसा नहीं रहा। इस प्रकार उनके आर्थिक और सामाजिक ढ़ांचे पर विपरीत असर पड़ा कहने अर्थ यह है कि सामाजिक रूप से वो तकसीम होकर एक अर्से तक जिए यह वेदना उम्रदराज मुस्लिम शिद्दत से समझते है, नौजवान उतना नहीं समझते बदले परिवेश में आज मुस्लिम युवा आज अपने अधिकार और अपने विकास के लिए एक बेहतर मुक़ाम पर खड़े हैं लेकिन ‘अहमर’ साहब बुज़ुर्ग हैं और उन्हें यह पीड़ा औरों से अधिक भोगी है। कोई तअज्जुब नहीं अगर यह ज़ख्म उनकी शाइरी में जगह जगह पाये जाते हैं लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी आवाज़ एक शाइर की आवाज़ है यानि ज़हानत की और शाइस्तगी की आवाज़ है। उन्होंने अपने हर अहसास को 20वी सदी के एक आम इंसान की आवाज़ के साथ हम आहंग किया है।

तुम्हारे हाथ के फेंके हुए पत्थर से निकला है

मेरे कपड़ो पे है जो खूँ, वो मेरे सर से निकला है

(

वो अपने अहले-ख़ाना के लिए रोटी कमाएगा

बिना कुछ खाके जो मज़दूर, अपने घर से निकला है

(

मैं वो नग़मा हूँ जो हर साज़ पे चल सकता है

एक ही लय का न पावन्द बनाओ मुझको

(

तंग गलियों में न देगा मेरी क़ीमत कोई

बेचना ही है तो बाज़ार में लाओ मुझको

(

हर चन्द कुछ नहीं है मगर कुछ न कुछ तो है

यह इन्क़लाबे-शामो-शहर कुछ न कुछ तो है

(

गर्दिश में बेसबब तो नहीं हैं नुजूमो-माह

आखि़र यह रोशनी का सफ़र कुछ न कुछ तो है

(

            ‘अहमर’ साहब शाइर हैं लिहाज़ा ख़ुदा के शिष्‍य हैं। उनकी नज़र अपने दौर की आभासी आत्मीयता, शातिर, चालों, सियासी साज़िशों और जीस्त के पेचोखम को पहचानती है। लेकिन वो मुहब्‍बत की दुनिया के बाशिन्दे हैं इसलिए ग़में दौराँ का मदावा उनके पास यही है कि अपनी आवाज़ से वो अपने दौर को रोशनी देते चले। उनकी शाइरी में अपने आप को समाज की कुटिलताओं से दूर रखने की आकांशा, ग़रीब और सर्वहारा वर्ग की खुशहाली की दुआ, तनहाई की राख से सर्वव्यापी हो जाने वाले अमृत की कीमिया नुमाया या पोशीदा है।

न डाल कशमकशे-इश्क़ में न डाल मुझे

मेरी हयात न दे रंजे-ला-ज़वाल मुझे

(

वफा, ख़ुलूस, मुहब्बत, मुरव्वततो-ईसार

इन आईनों में नज़र आ रहा है बाल मुझे

(

मेरे दम तक यह तग़ाफुल है तुम्हारा यारो

बन के रह जाओगे तस्वीरे-अलम मेरे बाद

(

मैं मुसाफिर हूँ मगर फिर भी है मुझमें यह कमाल

जिस जगह पर बैठ जाऊँगा वो घर हो जायगा

(

            आज ग़ज़ल में पहले की तुलना में कई गुना अधिक इन्तख़ाब और दीवान शाया होते है लेकिन तादाद बढ़ जाने के बावजूद स्तरीय अश्‍आर की संख्या पहले से उस अनुपात में अधिक नहीं हुई है। समय ने करवट बदली है तदानुसार भाशा और सामाजिक जीवन मूल्यों ने भी, आदमी भावुक कम है और व्यवहारिक अधिक होना चाहता है, लहू और रोशनाई से कम लिखा जा रहा है और सियाही से अधिक लिखा जा रहा है। अश्कों की तहरीर तो गुम सी हो गई है, ऐसे में अदब और आवाम दोनों की तलाश है कि परम्परा और प्रगति दोनों को हमसफ़र बनाकर चल सकने की कुव्वत रखने वाला क़लम कहाँ है। ‘अहमर’ साहब इस तलाश का वाजिब मुक़ाम हो सकते हैं उनके पास ज़बान की आसानी, ख़याल की गहराई और अहसास की शिद्दत है, और दूर देखने वाली नज़र है उनके साथ रिवायत है और उनकी तबीयत हस्सास है बयान मासूम, इसके आधार पर कहा जा सकता है कि उनका बयान देवनागरी पाठक वर्ग के आंतरिक शाइर ग्रुप में तो सराहा ही जाएगा बल्कि शाइरी के विस्तृत श्रोता वर्ग में भी इस कहन का उल्लास और उमंग से स्वागत किया जाएगा। यह इन्तख़ाब किसी मुस्तक़बिल की रूपरेखा नहीं है वरन सनद है ज़माने की शाइरी के फिक्रो-फ़न में पगी हुई उनकी सादगी में एक ज़बरदस्त कशिश है। उनका बयान पढ़ने के बाद और ज़्यादा पढ़ने की इच्छा होती है, और तब महसूस होता है कि आसान दीख पड़ने वाली यह शाइरी दरअस्ल तेहदार शाइरी है जहाँ अहसास की छुअन इतनी नाज़ुक है कि चेतना पर सीधे नहीं तो अवचेतना पर ज़रूर असर डालती है और अगली बार पढ़ने पर उनकी ग़ज़ल पहले से अधिक कशिश रखती है।

मेरी यादों को कलेजे से लगा ले जाइये

अपनी तन्हाई के ज़ख़्मो की दवा ले जाइये

(

आप ‘अहमर’ राह के हर मोड़ से वाक़िफ़ सही

फिर भी दीवानों से मन्ज़िल का पता ले जाइये

(

कैसी अजीब शय है यह आँखों की तिश्‍नगी12

तुम रूबरु हो और मेरा शौक़ कम नहीं

(

बदले जो सुब्हो-शाम तो हम भी बदल गये

मजबूर थे के वक़्त के साँचे में ढ़ल गये

(

हालात मेरे साथ कोई चाल चल गये

या मेरे दुश्मनों के इरादे बदल गये

(

कुछ शफ़क़ पर, कुछ क़बा-ए-गुल पे अफ़शाँ कर दिया

हर तरफ़ मेरे लहू ने रंग पैदा कर दिया

(

नुक़रई आवाज़ उस की दिल पे निश्‍तर सी लगी

साज़ की लय ने यह कैसा सोज़ पैदा कर दिया

(

 ‘अहमर’ साहब की आवाज़ कल की आवाज़ नहीं है यह किसी बेकल की आवाज़ नहीं है यह दिल की आवाज़ पर लगी हुई खिरद की सांकल की आवाज़ नहीं है यह नाज़नी की पायल की आवाज़ नहीं है वरन यह उस दिल की आवाज़ है जिसे बेइन्तहा ज़ख़्म मिले लेकिन उस दिल ने ख़ुद को ज़माने के लिए गु़लाब कर लिया। ज़िन्दगी उनको जितना अज़ाब दे सकती थी, दे चुकी है वक्त की आग उनके वुजूद को जितना राख कर सकती थी उतना राख कर चुकी है लेकिन ‘अहमर’ साहब की शाइरी ने इस राख से अमृत निकालने की कीमिया ढ़ूंड निकाली है और उनकी शाइरी उनके ख़ुद के ज़ख़्मों का मदावा हो या न हो, लेकिन एक आम इंसान के लिए इसमें तस्कीन की शाहराहें खुलती हैं इसमें कोई शक नहीं।

लम्हात जो याद आते हैं गुज़रे हुए कल के

सद अश्के-लहू रंग मेरी आँख से छल के

(

ठोकर भी उन्हीं लोगों को लगती है अमूमन

हर मोड़ से जो लोग गुज़रते है संभल के

(

मुझे ख़ुशी इस बात की है कि उनका बयानिया उर्दू ज़बान के साथ-साथ हिंदी ज़बान में भी प्रकाशित हो रहा है और इसके लिए अहमर साहब के ख़ानदान के नूर-ए-नज़र मोहम्मद जलीस सिद्दीक़ी की तारीफ़ करना लाज़मी है जिन्होंने इस किताब को शक्ल देने में मेहनत की और भाई शाहिद ख़ान का भी शुक्रिया अदा करना चाहूंगा जिन्होंने इस हीरे को परख कर उनके बयानिया को अपने पब्लिकेशन की राह से मंज़र-ए-आम किया।

            असीमित शुभकामनाओं के साथ

                                        मयंक अवस्थी

                                ए - 4/12 रिज़र्व बैंक अधिकारी आवास

                                    तिलक नगर, कानपुर-208002

  

‘’क़ादिरूल कलाम शाइर जनाब अहमर काशीपुरी’’

 

            ग़ज़ल एक सिन्फ-ए-शाइरी जो मक़बूल तरीन है। किसी ज़बान की आबरू इसका अदब होता है और अदब की आबरू उसकी शाइरी है और उर्दू शाइरी की आबरू ग़ज़ल है यह बिला शक कह सकते हैं। बर्सों पहले रशीद अहमद सिद्दीकी ने ग़ज़ल को शाइरी की आबरू कहा था। ग़ज़ल एक सिन्फ जिसकी एक तरीफ़ अमूमन बताई जाती है ख़वातीन से गुफ्तगू करना। मगर वक़्तन-फ़वक़्तन इस तारीफ़ से इन्हिराफ़ भी होता रहा है और इसका एअतराफ़ भी। कुछ का मानना है कि अरबी ज़बान में यह लफ्ज़ मुख़तलिफ़ आराब के साथ मुख़तलिफ़ तलफ्फुस की वजह से मुख़तलिफ़ माअनी रखता है। मगर औरतों से बात करना क़रीने क़यास माना जाता है। कुछ ने कहा इसका मतलब ऊन कातने से है, अगर ऐसा है तो लफ्ज़ में वुसअत आजाती है। किसी ने कहा कि ग़ज़ल यानी हिरन की उस मख़सूस आवाज़ से ताअ़बीर है जो वो तब ज़बान से निकालती है जब वो जंगली कुत्तों से घिर जाती है। हिरन के हलक़ से इस वक़्त जो आवाज़ बरामद होती है इसमें ख़ौफ़ भी होता है बेइख़्तियारी भी होती है और एहतेजाज भी होता है अगर यह सच है तो फिर ग़ज़ल की मज़मून आफ़रीनी में बेइन्तहा वुसअत पैदा हो जाती है।

            ख़ैर ग़ज़ल का मतलब कुछ भी बयान किया जाये मगर मेरी नज़र में ग़ज़ल एक जादू है, और उर्दू ग़ज़ल गौई एक जादूगरी। ग़ज़ल वो जादू है जो जब भी जादूगर की दस्तरस में रही उसे शुहरत दिलवाती है जब कि वो इस क़ाबिल हो वर्ना सरे बाज़ार रुस्वा भी कर देती है। मगर ‘अहमर’ काशीपुरी वो ग़ज़ल गौ हैं जो ग़ज़ल की नब्ज़ पर दस्तरस रखते हैं इसलिए ग़ज़ल ने उन्हें शोहरत दी मगर यह अफ़सोस की बात ज़रूर है कि इस क़दर अच्छा कहने वाले क़ादिरुल क़लाम शाइर को वो शोहरत और मक़बूलियत नहीं मिली जिसके वो बजातौर पर हक़दार हैं।

            मैं इनका तरफ़दार नहीं बल्कि ग़ैर जानिबदाराना तौर से यह कह रहा हूँ यक़ीन न आये तो उनके यह चंद अश्‍आर मुलाहिज़ा फ़रामा लीजिए।

दानिश्‍वराने-शहर में आता है जिसका नाम

वो भी जुनूँ के ज़ेरे-असर कुछ न कुछ तो है

(

तू हुस्ने-दिलनवाज़ का हामिल सही मगर

मेरा भी इन्तख़ाबे-नज़र कुछ न कुछ तो है

(

सदफ़ का खोलना मुश्किल नहीं आसान है लेकिन

ज़रा सी चूक हो जाये तो गौहर टूट जाता है

(

हमारे दिल का आईना तो ठहरा फिर भी आईना

मुसलसल चोट पड़ने से तो पत्थर टूट जाता है

(

यह मेरी ज़ात की अज़मत नहीं तो फिर क्या है

ग़मे-तवील दिया उम्रे-मुख़्तसर ने मुझे

(

मैं अपने पाँव के काँटे निकालता कैसे

कहीं क़याम की मोहलत न दी सफ़र ने मुझे

(

कोई बाज़ी न जीत पाए हम

ज़िन्दगी तुझसे बाज़ आए हम

(

वो अपने अहले-ख़ाना के लिए रोटी कमाएगा

बिना कुछ खाके जो मज़दूर, अपने घर से निकला है

(

            इनके कलाम को पढ़ने पर यह एहसास पुख़्ता हो जाता है वो शायराना उयूब से ख़ुद को बचाकर इस अन्दाज़ से शेअर कहते है कि तमाम तर शायराना ख़ूबियों का मुज़ाहिरा हो जाता है। इसके वाबजूद कि उनकी मुन्फरिद फिक्र है और ख़ूब शेअर कहते हैं मगर उर्दू ग़ज़ल के अहम सतून ग़ालिब व मीर को बतौर खि़राज पेश करते हुए कहते हैं।

ग़ालिबो-मीर के मन्सब को न पहुँचा कोई

यूँ तो लोगों ने बहुत क़ाफिया-पेमाई की

(

            ‘अहमर’ काशीपुरी का कलाम देखने पर ख़ूब अन्दाज़ा हो जाता है कि ज़बान फ़सीह और कलाम में शेरियत है तग़ज़्जु़ल है मगर सिर्फ रिवायत की तक़लीद नहीं है बल्कि असरी तक़ाज़ों को भी बख़ूबी अपने शेअरों में पेश करने का हुनर उन्हे मालूम है।

            असरदार और कामयाब व कारआमद शाइरी के लिए दिल का गुदाज़ हस्सास तो होना ज़रूरी है ज़हन भी ज़हने रसा होना चाहिए। इल्म की गीराई और गहराई भी दरकार होती है। ‘अहमर’ काशीपुरी के अश्‍आर को पढ़कर उन तमाम ख़ूबियों का अन्दाज़ा होता है कि ख़ुदा ने उन्हें यह औसाफ़ फ़राख़ दिली से अता किये हैं। उनकी गज़लों में फिक्र की बुलन्दी के साथ ज़बान व बयान की चाशनी, शुसतगी, सलासत और रवानी का बेहतरीन इम्तिज़ाज पाया जाता है। और एक सहर अंगेज़ी की फिज़ा महसूस होती है। इसलिए मैंने कहा था कि ग़ज़ल एक जादू का नाम और शाइरी से साहिरी का काम लिया जा सकता है।

            ज़िन्दगी और मौत के राज़ को तकरीबन हर शाइर ने अपने अपने तरीके से फाश करने की कोशिश की है ‘अहमर’ काशीपुरी ने भी इस पर निहायत पाये के शेअर कहे हैं।

आईने के टूटने को एक बहाना चाहिये

कौन जाने किस बहाने के लिए ज़िन्दा हूँ मैं

(

दो घड़ी के लिए मिल बैठ के जी लें वरना

मैं भी मरने के लिए आप भी मरने के लिए

(

            शाइरी बज़ाहिर आसान सिन्फ मान ली जाती है मगर यह तो बहुत मुश्किल काम है बक़ौल रशीद अहमद सिद्दीक़ी के रेज़ाकारी में मीनाकारी का अमल है। ‘अहमर’ साहब कह उठते हैं।

किस ने क्या सोचा किसी को क्या ख़बर

फिक्र को लफ्ज़ों का पैकर चाहिए

(

मुख़्तसर सी बात कहने के लिए

ज़हन मे लफ्जों का दफ्तर चाहिए

(

            आज जब कि उर्दू ज़बान और शायरी का बज़ाहिर हर जगह बोल-बाला नज़र आता है, मगर ज़्यादातर नुमाइशी हालात हैं, असल तो यह है कि उर्दू खुद उर्दूदाँ के घरों से बाहर होती जा रही है या फिर दहलीज़ पर खड़ी है। और बड़ी हसरत से पूछ रही है कि आऊँ या जाऊँ? रही बात शायरी की, तो मिक़दार तो इतनी देखी जा रही है कि सिर्फ इस बिना पर उसे शायरी का मक़बूल तरीन दौर कह दें? मगर जहाँ तक मयार की बात है, वह अफ़सोसनाक हद तक पस्त होता जा रहा है। ऐसे में अहमर साहब के ख़ानदान के अफ़राद क़ाबिले मुबारकबाद हैं कि उर्दू और शायरी की रिवायत उनकी कई पीढ़ियों में मौजूद है। उनके साहबज़ादे इक़बाल अदीब और तीसरी पीढ़ी में शारिक सिद्दीक़ी बाक़ायदा शायरी कर रहे हैं और वह भी एतमाद और शिद्दत के साथ। मैं शुक्रगुज़ार हूँ उनके सबसे छोटे साहबज़ादे मोहम्मद जलीस सिद्दीक़ी का जिन्होंने उनके कलाम को प्रकाशित कराने के लिए बड़ी मेहनत व मशक़्क़त की है और बेहद ख़ुशी की बात है कि अहमर साहब का कलाम उर्दू और हिंदी ज़बान में एक साथ शाया हो रहा है। आख़िर में अहमर काशीपुरी के इस शेर पर अपनी बात ख़त्म कर रहा हूँ इसमें उन्होंने अपनी शायरी की शिद्दत की तर्जुमानी कर दी है।

मेरे अश्‍आर को अश्‍आर को समझने वालो

यह मेरे खून से लिक्खी हुई तहरीरें है

(

आईने के टूटने को एक बहाना चाहिये

कौन जाने किस बहाने के लिए ज़िन्दा हूँ मैं

 

                                                        डा0 आज़म ‘सुकून’

                                                                   आई-193 पंचवटी कालौनी भोपाल म0प्र0



‘‘अहमरकाशीपुरी – जिनकी ख़श्‍बू कभी कम न होगी’’

 

            जिन लोगों ने उर्दू अदब की सैर की है वो जानते हैं कि ग़ज़ल का एक एक शेअर कहाँ कहाँ नक़ल किया जाता है और हर जगह ऐसा ठीक बैठता है कि जैसे वो जगह उसके लिए ख़ाली थी।

            अच्छे शेअर के बारे में बहुत सी परिभाषाऐं दी जा सकती हैं लेकिन सबसे अच्छी बात यही है कि जो शेअर पढ़ते ही या सुनते ही पढ़ने या सुनने वालों के दिल को छू जाये वही अच्छा शेअर है और वही कामयाब शाइर है।

            अच्छे शाइर और उरूज के उस्ताद जनाब डा0 आज़म साहब के लफ्ज़ों में ‘‘हर शाइर बस इसी कोशिश में लगा रहता है कि किसी तरह हमसे कोई ऐसा शेअर हो जाये जो लोगों के दिल को छू जाये और लोग उसे मिसालों के तौर पे इस्तमाल करने लगे यानी वो उनकी गुफ्तगू का हिस्सा बन जाये’’ और ऐसा जादुई हुनर क़िस्मत वालों को ही नसीब होता है।

            पिछले कोई दो बर्सों से मैं एक ऐसे शख़्स की शाइरी पढ़ रहा हूँ जिसके बयान की ताज़गी जादू की तरह अपनी तरफ़ ख़ीचती है और खु़शबू की तरह ज़हन में बस जाती है एक ऐसी ख़ुशबू जिसकी महक वक़्त के साथ बढ़ती जाती है। वो नाम है जनाब ‘अहमर’ काशीपुरी साहब का

            ‘अहमर’ साहब के कलाम की सबसे ख़ास बात यह है कि यह कभी ग़ज़लों के बाज़ार के आस पास भी नहीं फ़टका अक्सर मार्केट वेल्यू को ध्यान में रखकर की गई शाइरी, शाइरी की रूह को मार देती है ‘अहमर’ साहब की शाइरी उनकी बर्सों की मेहनत से जमा की गई अनमोल पूंजी है। जिस तरह मधुमक्खी बर्सों तक कोसों दूर उड़ कर जाती हैं और बूंद बूंद शहद लाकर अपने छत्ते में जमा करती हैं ठीक उसी तरह ‘अहमर’ साहब ने पूरी ज़िन्दगी ख़र्च करके शाइरी का यह दीवान बनाया है

जिसकी सनद भी उन्हीं के बयान से मिलती है।

अब और सोचना मेरे लिए है नामुम्किन

थका दिया है बहुत ज़हन के सफ़र ने मुझे

यह मेरी ज़ात की अज़मत नहीं तो फिर क्या है

ग़मे-तवील दिया उम्रे-मुख़्तसर ने मुझे

  (

हम इक्कीस वीं सदी के चमत्कारी वैज्ञानिक दौर से ज़रूर ग़ुज़रे हैं मगर मशीनों के इस युग ने इन्सानों को भी रोबोट बना डाला ह। विज्ञान की इस रोशनी में इन्सानियत ऐसे ग़ायब हुई है जैसे मोमबत्ती के जलने पर मोम ग़ायब हो जाता है। सियासत की उठाई नफ़रततों की दीवारों ने सबको ख़ानों में तक़सीम कर दिया है। शाइर का मन इन सब चीज़ों से दुखी होता है और हक़ीक़ते शेअर कुछ यूँ सामने आता है।

दो घड़ी के लिए मिल बैठ के जी लें वरना

मैं भी मरने के लिए आप भी मरने के लिए

(

बस एक हर्फे-ग़लत की तरह मिटा के मुझे

ज़माना ख़ुश है बहुत खा़क में मिला के मुझे

(

मौत की ठोकर भी लग ही जायेगी

ज़िन्दगी का बोझ सर पर चाहिए

(

 

            मुझे फुटपाथ पर पडे़ लोगों के भूख से मुरझाए हुए चेहरों को देखकर चाँद में किसी महबूबा का चेहरा नज़र नहीं आता, ‘अहमर’ साहब की नज़र अपने चारों तरफ़ के माहौल का बारीकी से मुआईना करती है और उनका कलाम ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाईयों को बयान करते हुए बढ़ता है।

वो अपने अहले-ख़ाना के लिए रोटी कमाएगा

बिना कुछ खाके जो मज़दूर, अपने घर से निकला है

(

कभी पढ़ता था कि ज़िन्दगी से बेहतर कोई उस्ताद नहीं यह जो सिखाती है वो ज़हन पर ऐसे छप जाता है जैसे पत्थर पे लकीर, ‘अहमर’ साहब ने ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी को अलग रूप में देखा है ज़िन्दगी की दुशवारियों की तरफ़ इशारा करते हुए यह शेअर उफ़!! क्या कहने।

ख़ुशी से कोई गले मौत को लगाता नहीं

वो क्या करे, के जिसे ज़िन्दगी ने छोड़ दिया

किसी ने कहा है।

अन्दाज़े बयाँ रंग बदल देता है वरना

दुनिया में कोई बात नई बात नहीं है

(

            लेकिन ‘अहमर’ साहब अपनी शाइरी में नई बातें भी करते हैं । जैसे यह शेअर मुलाहिज़ा फ़रमाऐं।

रात हम से ही न काटी गई तन्हाई की

तेरे ग़म ने तो बड़ी हौसला अफ़ज़ाई की

(

और उनके गुलिस्ताँ के कुछ और महकते हुए फूल पेश हैं।

दिन को ढ़लता देखकर यह ग़म हुआ

ज़िन्दगी का और एक दिन कम हुआ

(

साथ रहती है अन्जुमन में भी

मेरी तन्हाई का यह आलम है

(

मैं आँसुओं के समन्दर के पास बैठा हूँ

करे न फिक्र कोई मेरी तिश्‍नगी के लिए

(

मश्‍वरा अक़्ल का हमने नहीं तसलीम किया

हुक्म जब दिल ने दिया आप पे मर जाने का

(

            मैं शुक्रगुज़ार हूँ अहमर साहब के सबसे छोटे साहबज़ादे मोहम्मद जलीस सिद्दीक़ी का जिन्होंने उनके कलाम को कम्पोज़िट करने से लेकर प्रकाशित कराने तक बड़ी मेहनत की है और इस बात की और भी ज़्यादा ख़ुशी है कि अहमर साहब का कलाम उर्दू और हिंदी ज़बान में एक साथ प्रकाशित हो रहा है।

अब अगर कुछ लफ़्ज़ों में अपनी बात कहूँ तो अहमर साहब के शेर ऐसे दिए हैं जो अदब को मुद्दतों रोशन करते रहेंगे, यह ऐसे फूल हैं जिनकी ख़ुशबू कभी कम नहीं होगी और यह ऐसे सितारे हैं जिनकी चमक वक़्त के साथ बढ़ती जाएगी। दुआओं का मुंतज़िर।

 

         सिराज फैसल खान

विलेज महानन्दपुर

ज़िला सहारनपुर (यू0पी0)

 

 

आदाबो-अन्‍दाज़ की नुमाइन्‍दगी अहमरसाहब का कलाम

 

‘अहमर’ काशीपुरी जी, ‘‘दादाजी’’ उनके बारे में कुछ भी कहना सूरज को रोशनी दिखाने जैसा है। शेअरो-अदब का दिली ज़ौक़ रखने वाले पोशीदा ख़ुवाहिशात के शाइर जनाब ‘अहमर’ काशीपुरी जिनकी शाइरी बेश्‍तर मिसाल क़ायम करती है, ख़ासतौर पर इन्सानी जज्‍़बात और फिक्रो मुहब्बत उनकी ग़ज़लों में साफ़ नुमाया होती है। उनके यहाँ ग़ज़लें ताज़गी के साथ पूरी तरह अपने आदाबो अन्दाज़ की नुमाइन्दगी करती है।

यह न हो के मैं ख़ुश्बू की तरह से उड़ जाऊँ

यह न हो के तुम एक दिन ढूंडते फिरो मुझको

(

दो घड़ी के लिए मिल बैठ के जी लें वरना

मैं भी मरने के लिए आप भी मरने के लिए

(

            इन शेअरों की बानगी देखिए मैं भी मरने के लिए आप भी मरने के लिए, आज के दौर में जहाँ जीना मुहाल होता है और जहाँ सुकूँ की साँस लेना भी एक सज़ा से कम नहीं है उस दौर में ज़िन्दगी की एक तल्ख़ सच्चाई को इतनी आसानी से बयान करना कोई आम बात नहीं है। यह उनकी अदब से सच्ची मुहब्‍बत का ही कमाल है। उनकी शाइरी का मुताअला करने के बाद क़ारी खु़द ब खु़द एहसास के समन्दर में डूबता चला जाता है। उनकी शाइरी ज़ाती ज़िन्दगी के हर लम्हे को कै़द करने का हुनर जानती है।

            जब शाइर के ज़हन में उसके ख़्बाब छलकने लगते हैं तब शाइर उन्हें लफ्जों की पोशीदा पौशाक पहनाकर क़ारी के सामने रख देता है जहाँ शाइर की फिक्र की रोशनी हमें उस दुनिया से रूबरु करने का काम करती है जहाँ तक पहुँचना हर इन्सान के बस की बात नहीं है।

अब और सोचना मेरे लिए है नामुम्किन

थका दिया है बहुत ज़हन के सफ़र ने मुझे

मैं अपने पाँव के काँटे निकालता कैसे

कहीं क़याम की मोहलत न दी सफ़र ने मुझे

(

रात हम से ही न काटी गई तन्हाई की

तेरे ग़म ने तो बड़ी हौसला अफ़ज़ाई की

(

दिन को ढ़लता देखकर यह ग़म हुआ

ज़िन्दगी का और एक दिन कम हुआ

(

साथ रहती है अन्जुमन में भी

मेरी तन्हाई का यह आलम है

(

मेहफिल में भी तन्हा रहने का कितना ख़ूबसूरत बहाना है, और जब अन्जुमन में तन्हाई चुपके से चली आये तो फिर उस आलम का क्या कहना, इन शेअरों में जदीद मसोसात की तर्जुमानी नज़र आती है जहाँ उनकी ग़ज़लें मुन्फरिद कर्ब की तहज़ीबी एहमियत रखती है।

जाने कब बिछड़ जायें आओ आज जी भर कर

मैं भी देख लूँ तुमको तुम भी देखलो मुझको

(

मौत की ठोकर भी लग ही जायेगी

ज़िन्दगी का बोझ सर पर चाहिए

(

आईने के टूटने को एक बहाना चाहिये

कौन जाने किस बहाने के लिए ज़िन्दा हूँ मैं

(

            कहते हैं कि मोहब्बत के बिना शायरी अधूरी है, और हर शायर अपने अंदाज़ में इसका ज़िक्र करता आया है। मोहब्बत की संजीदगी दादाजी के लफ़्ज़ों में तमसील की हैसियत रखती है, एक बेचैनी जो क़ारी को तड़पा जाती है।
बेहद मस्रत का मुक़ाम है कि दादाजी का यह मजमूआ बहुत जल्द हिन्‍दी और उर्दू में प्रकाशित होने जा रहा है, जिसे मंज़र-ए-आम तक लाने के लिए दादाजी के फरज़ंद मोहम्मद जलीस सिद्दीक़ी ने दिन-रात मेहनत की है और अपने वालिद को बेहद ख़ूबसूरत तोहफ़ा दिया है।

            एक बेटी की हैसियत से दादाजी के लिए दो लफ़्ज़ कहने की हिम्मत की है, ख़ुदा करे उनका यह मजमूअ-ए-कलाम दूर-दूर तक शोहरतों के नए जिहात क़ायम करे और उफ़ुक़ के पार तक बुलंदियाँ हासिल करे।

                                                            सीमा गुप्ता

गुड़गांव हरियाणा

 

जिन लोगों से मैंने कहना सीखा हो उनके बारे में क्या कहूँ? कैसे कहूँ?

मैं तो हरगिज़ भी न था रूठ के जाने वाला

कोई होता तो सही, मुझको मनाने वाला

 

            मुद्दत पहले मैंने किसी से यह शेअर सुना था शेअर सुनते ही मुँह से आह निकली। लेकिन सुनाने वाले को भी इसके शाइर का नाम मालूम न था। यह शेअर मेरे बालमन पर यूँ नक़्श हुआ कि महीनों तक इसका जाप करता रहा और बर्सों बाद जब एक दिन काशीपुर की एक नशिस्त में एक बुज़ुर्ग और शाहिस्ता शाइर से यही शेअर सुना तो इतनी ख़ुशी हुई कि मेरी उम्र के लड़कों को सलमान ख़ान को रूबरु देखकर होती है।

            ‘अहमर’ साहब के यहाँ ग़ज़ल की क़दीम रिवायत सादा अल्फ़ाज़ की जदीद पौशाक में रवाँ दवाँ है। सादगी वफा और अज़मत न सिर्फ उनके फ़न बल्कि उनके शख़्सियत के भी हिस्से हैं। हम नयों के लिए तो वो एक चलते फिरते अदबी स्कूल हैं। अदबी गोडफादर या नाक़िद उन्हें मानें या न मानें लेकिन जानते ज़रूर हैं। और एक सच्चे शाइर के अन्दर जो एक क़लन्दर होता है उसे किसी के मानने या न मानने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। क्या ऐसे अश्‍आर बज़ाते खु़द सनद नहीं होते हैं?

रात हम से ही न काटी गई तन्हाई की

तेरे ग़म ने तो बड़ी हौसला अफ़ज़ाई की

(

कोई बाज़ी न जीत पाए हम

ज़िन्दगी तुझसे बाज़ आए हम

(

ज़ीस्त4 कतरा रही है यूँ हमसे

जैसे आये हों बिन बुलाए हम

(

            जब कभी आप शायरी के नाम पर मदारियों, तमाशे बाज़ों और गले बाज़ों को सुनकर मायूस हो जाएं या झुंझुला जाएं तो अहमर साहब के यहाँ आइए। यहाँ गज़ल बड़ी ख़ामोशी से अपने साधे, पुरवक़ार और ख़ुशबूदार लिबास में ज़िंदगी की गुलकारियाँ करती मिलेगी।

            मैं शुक्रिया अदा करता हूँ उन तमाम हज़ारात का जिन्होंने इस अदबी मजमूए को पब्लिश कराने में अपनी खि़दमात अंजाम दी हैं और मैं छोटे भाई मोहम्मद जलीस सिद्दीक़ी का भी शुकरगुज़ार हूँ जिनकी मेहनत और लगन की वजह से आज यह मजमूआ हम तक पहुँच रहा

                                                           

                                                                                                                                                               मनोज अज़हर

ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद (यू0पी)


उस्का तसव्वुर ज़िन्दगी की ताज़गी है

 

वो वादा करके न आएँ तो कोई बात नहीं 

सवाल यह है अगर आ गए तो क्या होगा 

 

हक़ीक़ी ज़िन्दगी की नज़ाकत को महसूस करना और उसके हर लम्हे को बेहद ख़ुशी से जीना ही असल ज़िन्दगी है। ज़िन्दगी वो नहीं है जो आप जी रहे हैं, बल्कि वो है जो आप जीना चाहते हैं। ‘उसका तसव्वुर’ हर लम्हा आपके ज़हन में ज़िंदा हो तो जीने का रास्ता आसान और ख़ूबसूरत हो जाता है। मशहूर शायर मुबारक हुसैन 'अहमर काशीपुरी' की ग़ज़लें ज़िन्दगी के इसी फ़लसफ़े को ख़ूबसूरती से बयान करती हैं। 

मोहतरम जनाब मुबारक हुसैन 'अहमर काशीपुरी' की पैदाइश 31 जुलाई 1932 को और वफ़ात 20 जुलाई 2024 को उत्तराखंड के काशीपुर शहर में हुई। शायरी का माहौल आबाई विरासत था, इसलिए बेतरतीब ज़िन्दगी की हलचल में उन्हें सुकून सिर्फ़ अपनी तख़लीकी सलाहियतों में ही मिला था। शानदार उम्र के मालिक अहमर साहब उर्दू अदब की कई अस्नाफ़ जैसे नात, हम्द, क़ता, रुबाई, नज़्म, क़सीदा और ग़ज़ल वग़ैरा पर लिखते रहे। उनकी ग़ज़लें नामवर अख़बारात और रिसालों में शाया होती रहीं और ऑल इंडिया रेडियो पर नश्र होती रहीं। वो मुकामी और बैरूनी मुशायरों की शान थे। 

उसका तसव्वुर’ अहमर काशीपुरी का एक मशहूर शेअरी मजमूआ है। इस किताब का दीबाचा उनके होनहार फ़र्ज़ंद मुहम्मद जलीस सिद्दीक़ी ने लिखा है। किताब में उर्दू अदब की नामवर शख़्सियतें जैसे अमीन जसपूरी, मयंक अवस्थी, डॉक्टर अज़म सुकून, सिराज फ़ैसल ख़ान, सीमा गुप्ता, मनोज अज़हर की मुबारक हुसैन अहमर काशीपुरी के साथ की यादें, उनकी हरफनमौला शख़्सियत और तख़लीकी सलाहियत पर तंकी़दी और अदबी तब्सिरे हैं। 

हाल पर मब्‍नी अहमर काशीपुरी की शायरी ज़िन्दगी के ताज़ा लम्हात से भरपूर लुत्फ़अंदोज़ होना चाहती है। वो न माज़ी से परेशान हैं और न मुस्तक़बिल से डरते हैं। उनके पास सिर्फ़ हाल की ताज़गी है, इसलिए वो हर जगह और हर वक़्त अपनेपन से भर देते हैं। उनका मानना है कि जो आज है और अभी है, तो क्यों न उसे अपना महबूब बनाया जाए। उनकी तख़लीक़ात से कुछ अश'आर ये हैं:

 

जाने कब तेज़ हवा किसको उड़ा ले जाए 

हम सभी फ़र्श पे बिखरी हुई तस्वीरें हैं 

  (

दो घड़ी के लिए मिल बैठ के जी लें वर्ना 

मैं भी मरने के लिए आप भी मरने के लिए 

  (

मैं मुसाफ़िर हूँ मगर फिर भी है मुझ में ये कमाल 

जिस जगह पर बैठ जाऊँगा वो घर हो जाएगा 

  (

वो अपने अहल-ए-ख़ाना के लिए रोटी कमाएगा 

बिना कुछ खा के जो मज़दूर अपने घर से निकला है 

(

वो बात करता है सबसे बड़ी मुरव्वत से 

किसी से मेरे सिवा दुश्मनी नहीं है उसे 

(

मैं दोस्तों से भी मुहतात होके मिलता हूँ 

बड़ा शऊर दिया दुश्मनों के डर ने मुझे 

 (

कोई बाज़ी न जीत पाए हम 

ज़िन्दगी तुझसे बाज़ आए हम 

 (

पड़ गए बल कई जबीनों पर 

जब तेरी अंजुमन में आए हम 

  (

जो तेरे ग़म को ग़म समझते हैं 

वो मोहब्बत को कम समझते हैं 

(

रात हम से ही न काटी गई तन्हाई की 

तेरे ग़म ने तो बहुत हौसला अफ़्ज़ाई की 

  (

मेरा अफ़साना ज़माने को सुनाया जाए 

शर्त ये है कि मेरा नाम न लाया जाए 

(

आप अहमर राह के हर मोड़ से वाक़िफ़ सही 

फिर भी दीवानों से मंज़िल का पता ले जाइए 

  (

बदले जो सुब्‍हो-शाम तो हम भी बदल गए 

मजबूर थे कि वक़्त के साँचे में ढल गए 

(

बिलाशुबा अहमर काशीपुरी के शेअरी मजमूआ ‘उसका तसव्वुर’ ने उर्दू अदब को माला-माल किया है। हिंदी में इस किताब की इशाअत होने से अहमर साहब की तख़लीकी दुनिया से तआरुफ़ का दायरा और वसीअ हुआ है। जनाब मुबारक हुसैन अहमर काशीपुरी के साहबज़ादे मुहम्मद जलीस सिद्दीक़ी ने अपने वालिद की तख़लीकी दुनिया को मुरत्तब करके उसे सजा-संवार कर एक ख़ूबसूरत किताब ‘उसका तसव्वुर’ की शक्ल में क़ारईन की नज़र पेश किया है। बाप की मादी दौलत पर तो हर किसी की नज़र रहती है लेकिन एक लायक़ बेटा ही बाप की अदबी दौलत को चार चाँद लगाता है। ऐसे नेक ख़याल को अमली जामा जलीस भाई ने पहनाया है। सही मायनों में उन्होंने एक होनहार और हमदर्द बेटे का फ़र्ज़ अदा किया है और अपने वालिद की विरासत को उनके नाम 'अहमर' की तरह अमर करने का अज़ीम काम किया है। ग़ज़ल का मजमूआ ‘उसका तसव्वुर’ ऐमेज़ॉन पर दस्तियाब है। 

नेक रूह को एक बार फिर सलाम। 

डॉ. अरुण कुकसाल

ग्राम-चामी, पोस्ट- सीरौं-246163

पट्टी- असवालस्यूं, विकासखण्ड- कल्जीखाल

जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड


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